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Tuesday, 15 August 2023

August 15, 2023

नपुंसक योग की जानकारी कुंडली से कैसे जानें(How to know the information of Impotent Yoga from the kundali)

नपुंसक योग की जानकारी कुंडली से कैसे जानें(How to know the information of Impotent Yoga from the kundali):-प्रत्येक स्त्री-पुरुष जब विवाह के बंधन में बंध जाते हैं, तब उनको अपने जीवनसाथी को शारीरिक सुख से खुश करने की चाहत रहती हैं और वे एक-दूसरे को पूर्ण रूप से शारीरिक सुख देना चाहते हैं। कोई भी आदमी या औरत जब शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं, तब उनमें एक-दूसरे के प्रति हीन भावना घर कर जाती हैं और उनका दाम्पत्य जीवन नरक के समान हो जाता हैं और आये दिन गृह-क्लेश और तलाक तक कि नौबत तक आ जाती हैं। लेकिन आदमी या औरत की जन्मकुण्डली का उचित विश्लेषण करवाकर शादी से पूर्व करवाकर जाना जा सकता हैं, किस में कमी हैं। इसलिए ज्योतिष शास्त्र में वर्णित योगों के द्वारा नपुंसकता के कारणों जाना जा सकता हैं। जिससे शादी होने पर पति-पत्नी को शारीरिक सुख की पूर्ण प्राप्ति हो सके। आईए जानते हैं, जन्मकुंडली से बनने वाले नपुंसक योग के कारणों के बारे में?  


How to know the information of Impotent Yoga from the kundali




नपुंसकता का अर्थ :-आदमी और लड़कों में वीर्य धातु का नष्ट होना होता है, जिससे वह औरत या लड़की के साथ सहवास क्रिया नहीं कर पाता है व औरत या लड़की को सहवास क्रिया से संतुष्ट नहीं कर सकता है, उस बीमारी को नपुंसकता कहते है।



मनोवैज्ञानिक नपुंसकता:-आदमी या लड़को में चिंता या आशंका के कारण  यौनक्रिया को सफलतापूर्वक पुुरा न कर पाते है, तो उस तरह की नपुंसकता को मनोवैज्ञानिक नपुंसकता कहते है। जो आदमी या लड़के इरेक्शन प्राप्त करने को लेकर चिंतित होते है वह इस मामले में कभी भी सुकून से नहीं रह सकता और शायद इरेक्शन हासिल भी नहीं कर पाते है।



मनोवैज्ञानिक नपुंसकता के कारण:-आदमी या लड़कों के द्वारा अधिक दारू पीने, शरीर में वसा के अधिक इकट्ठा होने मोटापा का होना, बहुत गुस्सा करने से, मन के अंदर तनाव का होना, चिंता, अपराध बोध से ग्रस्त होने और अन्य कई तरह के भावनात्मक कारणों की वजह से मनोवैज्ञानिक नपुंसकता  होती है।



शारिरिक नपुंसकता:-आदमी या लड़को में जब उनकी माता के गर्भ में उनका निर्माण होता है, तब उनकी माता गर्भ में किसी तरह का गर्भ निर्माण के समय किसी तरह का शरीर का पूर्ण तरह से विकास नहीं हो पाता है जिससे उन आदमी या लड़कों के शरीर के अंग में कमी रह जाती है और वह युवावस्था में नपुंसकता का शिकार हो जाते है।




शारीरिक नपुंसकता के कारण:-आदमी या लड़कों के शरीर में किसी तरह की चोट लगने, बीमारी, हार्मोन के ठीक नहीं होने से, मधुमेह, उच्च रक्तचाप या नशीली दवाओं की वजह से शारिरिक नपुंसकता हो सकती है।



ज्योतिषीय योग के द्वारा नपुंसकता:-आदमी या लड़कों  में नपुंसकता के दोष को जन्मकुंडली को देखकर जान सकते है, की नपुंसकता जन्मजात है या किसी दूसरे शारिरिक या मानसिक वजह से है। नपुंसकता को जानकर विवाह करवाते है तो उन मानवों का वैवाहिक जीवन खुशहाली से बीतता है। कुछ ज्योतिषीय योग निम्न तरह के है, इन योगों से जान सकते कि अमुक आदमी या लड़के में नपुंसकता गुण है।



◆यदि बुध+शनि का सयोंग सातवें व आठवें घर में होनें पर आदमी या लड़के नपुंसक होता हैं।



◆यदि मंगल या शनि या इन दोनों की दृष्टि आठवें घर में स्थित शुक्र पर हो, तो आदमी या लड़के को धातु या वीर्य सम्बन्धी बीमारी या हस्तमैथून खराब रुचि होती हैं।



◆यदि शनि की दृष्टि आठवें घर में स्थित शुक्र+मंगल के सयोंग पर हो, तो आदमी या लड़के को धातु या वीर्य सम्बन्धी बीमारी या हस्तमैथून और अण्डकोषों से सम्बन्धी बीमारी हो सकती है।



◆यदि शनि की दृष्टि सातवें घर में स्थित शुक्र+मंगल के सयोंग पर हो, तो आदमी या लड़के को मैथुन से मैथुन सम्बन्धी बीमारी हो सकती है।



◆यदि जन्मकुंडली के आठवे घर में शुक्र के साथ शनि या राहु स्थित हो, तो आदमी या लड़कों को वीर्य सम्बन्धी बीमारी और हस्तमैथून की खराब रुचि हो सकती हैं।



◆आठवें घर में बुध हो और पहले घर में शनि के साथ राहु का सयोंग हो, तो आदमी या लड़कों में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसक होता हैं।



◆यदि शनि या राहु या केतु में से कोई एक भी ग्रह शुक्र व चन्द्रमा के साथ में हो, तो आदमी या लड़को में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसक होते है।



◆यदि मंगल या राहु या केतु में से कोई एक भी ग्रह चन्द्रमा व शनि के साथ में हो, तो आदमी या लड़को में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसक होते है।



◆आठवें घर में शनि के साथ में राहु या केतु वृश्चिक या कुम्भ लग्न की कुंडली में हो, तो आदमी या लड़कों में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसक होते है।



◆यदि शुक्र अस्त हो या नीच राशिगत हो और पहले घर में शनि+राहु का सयोंग होनें पर भी आदमी या लड़कों में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसक होते है।



◆यदि बुध एवं शनि का सयोंग किसी भी घर में हो और शुक्र अस्त होकर साथ में हो, तो आदमी या लड़कों को पुरुषत्व की कमी या नपुंसकता बीमारी होती हैं।



◆आठवें घर में पापग्रह बैठे हो और उन पर पापग्रहों की दृष्टी होने पर भी आदमी या लड़कों में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसकता या गुप्त बीमारी हो सकती हैं।



◆आठवें घर और आठवें घर के स्वामी पर पापग्रह और शनि के द्वारा देखा जाये सिंह या कन्या लग्न की कुंडली में हो, तो आदमी या लड़कों में पुरुषत्व से कमजोर या नपुंसक होते है।


◆यदि गुरु छठवें घर में स्थित हो वृषभ या सिंह लग्न की कुण्डली में तो आदमी या लड़को को कोई गुप्तांग बीमारी हो सकती हैं।


Sunday, 9 April 2023

April 09, 2023

जन्मराशि और नामराशि का महत्त्व क्या है?(What is the importance of birth sign and name sign?)

जन्मराशि और नामराशि का महत्त्व क्या है?(What is the importance of birth sign and name sign?):-जब भी किसी बालक का जन्म होता हैं, तब उसके जन्म के समय पर उसका नामकरण संस्कार किया जाता हैं, उस बालक को जो नाम दिया जाता हैं, वह नाम उसके जन्मसमय के आधार पर होता हैं, लेकिन परिवार के सदस्य उस बालक को प्यार से अलग नाम से पुकारते हैं। इस तरह उसको दो नामों से जाना जाता हैं एवं इन दोनों नामों से उसका जीवनकाल चलता रहता हैं। लेकिन जन्मराशि और नामराशि का उपयोग भिन्न-भिन्न जगहों पर ज्योतिष के कार्यों में किया जाता हैं। सभी विषय में जन्मराशि की प्रमुखता नहीं रहती है तो सभी जगह नामराशि की भी प्रमुखता नहीं रहती हैं।



What is the importance of birth sign and name sign?




आर्ष प्रमाणों (शास्त्र प्रमाणों) के आधार पर:-वैवाहिक ग्रह मैत्री, अष्टकूट मिलान एवं गुणांक मिलान जन्म नाम राशि के अनुसार करना उत्तम रहता है। 




इसलिए शास्त्रों के आधार पर:-


"विवाहे सर्वमांगल्येयात्रादौग्रहगोचरे।


जन्मराशे:प्रधानत्वं नाम राशिं न् चिनयेत्।।"



अर्थात्:-विवाहकार्य, सभी मांगलिक कार्यों में (उपनयनादि), यात्रा के संदर्भ में मुहूर्त-यात्रा विशेष मुहूर्त, दिन-मान ग्रह गोचर गणना दिनदशा गोचर पद्धति से वर्तमान में ग्रहों का फलित जानने के लिए जन्म राशि से विचार करना चाहिए, न् की नाम राशि से।


"देशेग्रामेगृहेयुद्धेसेवायांव्यवहारके।


नामराशे: प्रधानत्वंजन्मराशिं न् चिनयेत्।।"


अर्थात्:-देश, ग्रामवास, नगर, घर, युद्ध, सेना, न्यायालय, कोर्ट, रजिस्ट्रीकरण आदि में नाम राशि की ही प्रमुखता रहती हैं। बारे में बताया गया है। 



यथा सूत्र पुनरपि:-बारे में बताया गया है।


काकिण्यां वर्गशुद्धौ च वादे द्युते स्वरोदये।


मंत्रे पूनर्भूवरणे नामं राशे:प्रधानता।।"


अर्थात्:-नाम राशि से विचार करना चाहिए।



षोड्श संस्कारों के:-बारे में बताया गया है।


"कुर्यात्षोडश कर्मांणि,जन्म राशे र्बलान्विते।


सर्वाष्यन्यानि कर्मांणि, नामराशे र्बलान्विते।।"


"आपदा-रोग-कष्टेषु विवाहे गृह. पूजने।


जन्मराशे:प्रधानत्वं नाम राशिं न् चिनयेत्।।"


अर्थात्:-मुसीबत के समय, बीमारी के समय, मानसिक दु:ख या परेशानी में एवं विवाह से सम्बन्धित मेलापन, वैवाहिक लग्न निर्धारण में और ग्रह शान्ति के उपाय के समय जन्मराशि से विचार करना चाहिए।



स्त्री-पुरूष राशि मान्यता हेतु विचार विशेष वचन:-इस हेतु शास्त्र वचन मुहूर्त चिन्तामणि अनुसार यह है कि




"स्त्रीणां विधोर्बलमुशन्ति विवाह गर्भ-


सन्स्कारयोरितर कर्मसु भर्तुरेव।"




अर्थात्:-विवाह गर्भाधान पुंसवन-आगरणी-सीमन्त-पुत्र कामना संस्कार में स्त्री की जन्म राशि से चंद्रमा बल गणना का निर्णय करना चाहिए। इसके अलावा अन्य सभी कार्यों में मूल रूपेण पति की जन्म राशि से ही विचार करना चाहिए।


स्पष्ट शास्त्र वचनमेतद।


मुहूर्त शास्त्रीय नियामक से एक सूत्र वचन यह भी है कि यदि जन्म नक्षत्र, राशि आदि मालूम नहीं हो तो नाम राशि से विवाह आदि अन्य कार्यों का और लग्न बल से देख लेना चाहिए।




अतः आवश्यक रूप से जन्म नक्षत्र जन्म राशि एवं जन्म कुंडली से वर-वधु मेलापन करना चाहिए तथा विवाह लग्न निर्धारण में त्रिबल शुद्धि का विचार करने के लिए भी वर-वधु दोनों ही की जन्म राशि को आधार बनाया जाना चाहिए। यदि जन्म नाम ज्ञात ना हो तो क्या करना चाहिए ऐसी स्थिति में शास्त्रों में बताया गया है-


"यथा विवाहघटनं चैव लग्नजं ग्रहजं बलम्।


नामभादविचिन्तयेत् सर्व जन्म न ज्ञायते यदा।।"


अर्थात्:-वैवाहिक कार्यक्रम की योजना जन्मकालिक ग्रह स्थिति के आधार पर विचार किया जाना चाहिए। जब जन्म राशि नक्षत्रादि ज्ञात नहीं हो तो उपरोक्त विचार नामराशि से मुहूर्त लग्न बलादि का ज्ञान करना चाहिए।




1.जन्म राशि से मेलापन एवं वैवाहिक त्रिबल शुद्धि का विचार केवल कन्या के प्रथम विवाह के संदर्भ में ही करना चाहिए। यदि कन्या का दूसरा विवाह या पुनर्विवाह या नाता, नातरा (पूनर्भूवरण) हो तो जन्म राशि से विचार करने की आवश्यकता नहीं होती है। केवल दोनों के नामों के आधार पर नक्षत्र निर्धारण करके मैत्री देखना चाहिए।




2.जुआ या द्यूत खेलने तथा बुखारादि की स्थिति में नाम राशि से विचार करना चाहिए।




3.जहां कुण्डली मिलान और वैवाहिक लग्न निर्धारण के लिए वर एवं कन्या की जन्म राशि से विचार करना चाहिए।




4.जन्मराशि का जन्मराशि से व नामराशि से नामराशि का मेलापन करना चाहिए।




सूर्य सिद्धांत में नामकरण की विधाओं:-का निम्न प्रकार से किया गया है




1.कृष्ण पक्ष में दिन के समय जन्म होने पर सूर्य जिस नक्षत्र एवं चरण में हो उसके वर्ण के अनुसार  नामकरण करना चाहिए।




2.यदि शुक्ल पक्ष में और रात्रि के समय जन्म होने पर चंद्रमा की राशि नक्षत्र एवं नक्षत्र चरण के अक्षर के अनुसार नामकरण करना चाहिए।




3.जब एक का कृष्ण पक्ष रात्रि में जन्म हुआ दूसरे का शुक्ल पक्ष में दिन के समय जन्म हो तो जन्म कुंडली में सबसे बलवान ग्रह की राशि, नक्षत्र एक नक्षत्र चरण पर उसकी तत्कालीन स्थिति के आधार पर वर्ण के अनुसार नामकरण करना चाहिए।




4.चंद्रमा पृथ्वी के अधिक निकट एवं तेज गति से चलने वाला ग्रह होने से मनुष्य पर चंद्रमा का विशेष प्रभाव पड़ने से परिवर्तन भी जल्दी होता है, इसलिए यह परंपरा बन गई है कि चंद्रमा के नक्षत्र के आधार पर नामकरण किया जाता है।




5.इसके अतिरिक्त विंशोत्तरी महादशा इत्यादि दशाओं का निर्णय भी चंद्रमा के नक्षत्र से ही किया जाता है। अतः स्पष्ट होता है कि अन्य ग्रहों की तुलना में चंद्रमा का प्रभाव मानव पर अधिक पड़ता है। 




वेद में कहा गया है कि:-


"चंद्रमा मनसो अजायत" 


अर्थात्:-परम पुरुष परमात्मा के मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ है अतः चंद्रमा का सम्बन्ध मन से ही हैं। अतः मन के कारण चन्द्रमा के आधार पर नामकरण करना अधिक तार्किकदृष्टि से भी औचित्यपूर्ण है।


मन्तव्यता गोचर गणना विषये:-


"उच्चराशिगतो भानुरूच्च राशिगतो गुरु:।


रिष्फा१२अष्ट८तुर्यगो४अपीष्टो निचारिस्थ शुभोप्यसत्।।"


अर्थात्:-उच्च राशि मेष का सूर्य तथा कर्क राशि का गुरु 4-8-12वी शुभ माने गए हैं तथा सूर्य 4-8-12 का होना भी शुभ राशि रहते 13 अंश बाद शुभ ही मान्य है यथा


"अनिष्ठ स्थानगेषु त्रयोदशदिनं 


त्यक्त्वा शेषस्थं शुभमादिशेत्।।"




अर्थात्:-इसी प्रकार चंद्रमा शुभ व मित्र ग्रह के नवांश तथा बृहस्पति से देखा जावे तो अशुभ होने पर शुभ मान्य है। सूत्र


"शुभांशेगुरुद्द्ष्टोअशुभोपि सन्।"




एवमेव 4-8-12 गणना का गुरु भी शुभ होता है यदि गुरु अपनी उच्च राशि-कर्क,स्वगृही-धनु-मीन एवं मित्र राशि तथा किसी भी राशि में अपने नवमांश में रहते 4-8-12 वां बृहस्पति शुभ मान्य। विशेष यह की गुरु अपनी नीच-मकर राशि व शत्रु ग्रह की राशि में हो तो शुभ भी अशुभ मान्य होगा। यथा प्रमाण


"स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे वर्गोत्तमे गुरू:।


रिष्फा १२अष्ट ८ तुर्यगो ४ अपीष्टो


निचारिस्थ: शुभोप्यसन।।"




अष्टकवर्गरेखाष्टक शुद्धि विधान:-गोचर गणना से अशुभ 4-8-12 गणना के सूर्य-चंद्रमा-बृहस्पति आते हों तो रेखाष्टक गणना बल से अशुद्ध गोचर में भी शुभ कार्य संपन्न कर सकते हैं।


यथा शास्त्र वचन:-


"अष्टकवर्गविशुद्धेषु गुरूशीतांशुभानुषु।


व्रतोद्वाहौ च कर्त्तव्यौ गोचरे न कदाचन।।"


ग्रन्थान्तरे अपिराजमार्त्तण्डेतु-


"अष्टवर्गेण ये शुद्धास्ते शुद्धा: सर्वकर्मसु।


सुक्ष्माअष्ठ वर्ग संशुद्धि:स्थूला शुद्धिस्तु गोचरे।।" 




अर्थात्:-लग्न समय पर सूर्य, चंद्रमा, गुरु का अपना-अपना रेखाष्टक बल प्राप्त करें यदि 1 से 3 रेखा ग्रह की आवे तो ग्रह का बल प्राप्त नहीं,नेष्ट समझें।




2.यदि 4 या अधिक 8 तक रेखा बल प्राप्त होने पर 4-8-12 गणना के सूर्य चंद्रमा गुरु गोचर में रहते भी मांगलिक कार्य का विधान शास्त्र सम्मत कहा गया है 




द्वादश 12 चन्द्रमा की शास्त्रीय मान्यता:-


"अभिषेके निषेके च प्राशने व्रत बन्धने तीर्थ


यात्रा विवाहे च चन्द्रो द्वादशग:१२शुभ:।।"



परन्तु:-"सर्वेषु शुभ कर्मेषु चन्द्रो द्वादशग:शुभ:।


नारीणां द्वादशश्च्ंद्र:मृत्यु हानिकरस्तदा।।"



अर्थात्:-स्त्रीयों के लिए बारहवाँ चन्द्रमा वर्जित और पुरुषों के लिए बारहवाँ चन्द्रमा शुभ माना गया है।

Monday, 23 January 2023

January 23, 2023

शनि का द्वादश राशियों में क्या प्रभाव होता हैं?(What is the effect of Saturn in twelve zodiac signs?)

शनि का द्वादश राशियों में क्या प्रभाव होता हैं?(What is the effect of Saturn in twelve zodiac signs?):-शनि के द्वादश राशियों में फल शास्त्रों में निम्नानुसार बताए गए हैं।




What is the effect of Saturn in twelve zodiac signs?



1.मेष राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि मेष राशि में स्थित हो, तो जातक मूर्ख, आवारा, क्रूर, जालफरेब करने वाला, झगड़ालू, उल्टे दिमाग वाला और दु:खी होता है। 




2.वृषभ राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि वृषभ राशि में स्थित हो, तो जातक धोखेबाज, सफल, एकांतप्रिय, संयमी और छोटी-छोटी बातों के कारण चिंतित होने वाला होता है। 





3.मिथुन राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि मिथुन राशि में स्थित हो,तो जातक दु:खी, गंदा, कमजोर, कम संतान वाला और संकीर्ण मन वाला होता है।




4.कर्क राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि कर्क राशि में स्थित हो, तो जातक गरीब, हठी, कम संतान वाला, स्वार्थी और मामा से बिछोह वाला होता है। 





5.सिंह राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि सिंह राशि में स्थित हो, तो जातक हठी, कम संतान वाला, अभागा, अच्छा लेखक और ईष्यालु होता है।




6.कन्या राशि:-जन्म कुंडली में शनि कन्या राशि में स्थित हो, तो जातक गरीब, ईष्यालु स्वभाव वाला, झगड़ालू, असभ्य, कमजोर स्वास्थ्य वाला और पुराने विचारों वाला होता है। 





7.तुला राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि तुला राशि में स्थित हो, तो जातक प्रसिद्ध नेता, राजनीति में रुचि रखने वाला, धनवान, सम्मानित, शक्तिशाली, दानशील और परिस्थितियों में रुचि रखने वाला होता है। 





8.वृश्चिक राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि वृश्चिक राशि में स्थित हो, तो जातक उतावला, कठोर हृदय, संकीर्ण विचारों वाला, हिंसक प्रवृत्ति वाला, दु:खी, विष से खतरा, कमजोर स्वास्थ्य वाला, गरीब और बुरी आदतों वाला होता है।





9.धनु राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि धनु राशि में स्थित हो, तो जातक सक्रिय, चतुर, प्रसिद्ध, शांतिप्रिय, दु:खी विवाहित जीवन में जीने वाला और धनवान होता है। 





10.मकर राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि मकर राशि में स्थित हो, तो जातक कुशाग्र बुद्धि वाला, परिश्रमी, अच्छा घरेलू जीवन जीने वाला, विद्वान, सन्देह करने वाला, बदला लेने वाला और दार्शनिक होता है।





11.कुम्भ राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि कुंभ राशि में स्थित हो, तो जातक नीति में दक्ष, योग्य, सुखी, कुशाग्र बुद्धि वाला और शक्तिशाली शत्रु वाला होता है। 





12.मीन राशि:-यदि जन्म कुंडली में शनि मीन राशि में स्थित हो, तो जातक धनवान, प्रसिद्ध, नम्र, सुखी और दूसरों की सहायता करने वाला होता है।



Tuesday, 13 December 2022

December 13, 2022

मानव की सुंदरता-बदसूरती में ग्रहों की भूमिका (The role of planets in the beauty-ugliness of human

मानव की सुंदरता-बदसूरती में ग्रहों की भूमिका(The role of planets in the beauty-ugliness of human):-सुंदरता-बदसूरती मानव को उसके के द्वारा पूर्वजन्म में किये हुए कार्यों के आधार पर अगले जन्म में मिलती हैं। जो मनुष्य अच्छे कर्म करते हैं, उनको अगले जन्म में शरीर की बनावट एवं रूप-रंग अच्छा मिलता हैं। इसलिए सुंदरता प्राणी मात्र को मिला प्रकृति का अनुपम उपहार है। मनुष्य का शरीर पंचतत्वों से मिलकर बनता हैं और इन पंचतत्वों में विलीन हो जाता हैं। पंचतत्वों पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश से बना शरीर दूसरों को अपनी तरफ खींचने वाला व दूसरों के द्वारा नफरत दोनों का मुख्य स्थान होता है। सभी का जन्मदाता एक ईश्वर है, तो जन्म के बाद रंग, रूप, वाणी, विचार, सबके अलग-अलग होते हैं। 


The role of planets in the beauty-ugliness of human




जातक के जन्म के बाद सारा जिम्मा नवग्रहों का ही होता है। जातक के प्रारब्ध के आधार पर नवग्रह प्रकृति के द्वारा निर्धारित शुभ-अशुभ फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार अंतरण को आह्लादित करने वाली सुंदरता पर नवग्रहों का व्यापक प्रभाव पड़ता है।




ज्योतिष शास्त्र के अनुसार:-जातक या जातिका की जन्मकुंडली में शुक्र, चन्द्रमा व बुध का योग होने पर वह सुंदरता की प्रतिमूर्ति बनता है।



नवग्रहों में शुक्र को सुंदरता, चंद्रमा को कांति व सौम्यता, बुध को वाणी की कुशलता व चिरयौवन देने वाला, सूर्य को तेज, मंगल को आकर्षक व लाल रंग या रक्तवर्ण शरीर और गुरु को आकर्षण के साथ सुंदर नाक-नक्श प्रदान करने वाला माना जाता हैं। 




सुंदरता देने में शनि का भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि शनि पतली काया, घने-गहरे काले बाल, बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें देने वाला होता है। 



जन्मकुंडली में किसी एक ग्रह का विशेष प्रभाव होने पर जातक के उस ग्रह से संबंधित अंगों पर:-उसका प्रभाव दिखता है।



●यदि शुक्र लग्न में हो, तो जातक बहुत ही सुंदर होता है।



●यदि शुक्र के साथ लग्न में यदि शनि होने पर जातक का शरीर कांतिमय व पतला रहता है।



●यदि शुक्र के साथ सूर्य होने पर जातक के बाल मखमल के समान चमकीले होते हैं।



●यदि शुक्र और सूर्य के साथ यदि बुध हो, तो जातक के बाल घुंघराले होते हैं।



●यदि शुक्र के साथ यदि चंद्रमा व शनि भी  मिल जाए तो जातक का चेहरा ओर भी आकर्षण प्रदान करने वाला होता है, व उसके बालों की सुंदरता ओर भी अधिक आकर्षक होती है।



●यदि चंद्रमा बलवान या वर्गोत्तम हो, तो जातक अपनी मुस्कान से पतझड़ में भी बाहर ला देता है। 




स्त्री जातक के शरीर का सुंदर:-होने के कारण ज्योतिष शास्त्र में निम्नलिखित है:



यदि स्त्री जातक की जन्मकुंडली में शुभ ग्रह के साथ यदि पाप या क्रूर ग्रहों का मेल हो जाए तो विशेष गुण देखने को मिलते हैं।



●अकेला शुभ ग्रह हो, तो मोटापा लाकर उसकी सुंदरता को बिगाड़ देता है 



●स्त्री जातक की जन्मकुंडली में लग्न से द्वितीय व द्वादश भाव में शुभ ग्रह हो, तो उसकी आंखें अलग प्रकार की  एवं गजब होती है।



●यदि द्वितीय भाव और द्वादश भाव में शनि हो, तो स्त्री जातक की आंखें बड़ी-बड़ी गोल होती हैं। ऐसे जातक स्त्री को 'विलोलनेत्रा तरुणी सुशीला' कहा जाता है।



●यदि सूर्य-शुक्र का मेल होने पर पतले मगर भरे-भरे होंठ व आकर्षक चेहरा प्रदान करने वाला होता है।


●यदि सूर्य-शुक्र के साथ गुरु का भी मेल हो, तो जातक की नाक सुंदर होती हैं।



●इसी प्रकार अग्नि तत्व प्रधान राशियों मेष, सिंह और धनु की स्त्री जातक के शरीर का अधोभाग ज्यादा सुंदर होता है



●यदि पाप, क्रूर ग्रह (मंगल, सूर्य, केतु आदि) उपस्थित हो तो उसकी सुंदरता को चार चांद लग जाते हैं।



●नारी की सुंदरता का अभिन्न अंग उरु प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर्क राशि, जबकि कमर या कटी प्रदेश का प्रतिनिधित्व कन्या राशि करती हैं।



●इसमें यदि बुध स्थित हो तो जातक की कमर पतली  इसके साथ ही शनि हो, तो कमर अत्यंत पतली होती हैं। ज्योतिष में शनि को कमजोर शरीर को योगी माना गया है और सुंदरता के लिए कमजोर शरीर वाला व योगी माना गया है और सुंदरता के लिए कृशशरीर होना जरूरी है।



ज्योतिष शास्त्र में शनि को सांवली सूरत का प्रतिनिधित्व ग्रह माना जाता है फिर भी यह जातकों को अतिसुंदर बना देता है। गोरों लोगों से सांवले रंग वाले अधिक आकर्षक और सुंदर होते हैं इस प्रकार शनि के योग के बगैर सुंदरता कोई पैमाना अधूरा माना जाता है और आकर्षक लोगों पर शनि का अधिकार होता है।



◆यदि शनि धनु राशि या मकर राशि में हो तो जातक का जानु प्रदेश (जंघा, घुटनाआदि) एक समान होते है। 



◆जबकि मीन राशि के गुरु के साथ मंगल होने से जातक के पांव कोमल व लाल तथा नाखून आकर्षक होते हैं।




Thursday, 22 September 2022

September 22, 2022

मानव जीवन पर नक्षत्र का प्रभाव(Effect of constellation on human life)

मानव जीवन पर नक्षत्र का  प्रभाव(Effect of constellation on human life):-नभमण्डल को बारह राशियों में बांटा गया है। जो चमकते हुए तारों के समूह को सत्ताईस भागों में बांटा है, वे सत्ताईस नक्षत्र है। सभी के नाम को निश्चित किया है। 



ऋषियों-मुनियों ने ग्रहों के साथ नक्षत्रों के भी खोज की और मानव जीवन पर नक्षत्रों के प्रभाव का गहरा अध्ययन करके इसे ज्योतिष विज्ञान के रूप में पेश किया है। मानव जीवन पर नभ मण्डल के नक्षत्रों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है क्योंकि जन्मपत्रिका नभ मण्डल का ही चित्र हैं। 



सत्ताईस नक्षत्रों के मालिक नौ ग्रह को माना है। सवा दो नक्षत्र एक राशि में होते हैं। सत्ताईस नक्षत्रों को बारह राशियों में बांटा गया है इस प्रकार एक राशि में नौ अक्षर बताए गए हैं। एक नक्षत्र में चार चरण या चार अक्षर होते हैं  सवा दो नक्षत्र बीतने पर राशि बदल जाती हैं। सभी ग्रहों के राशिं बदलने का अलग-अलग होता है। चन्द्रमा सवा दो दिन में सबसे पहले राशि को बदलता है जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में जिस नक्षत्र पर होता हैं, वही जातक की जन्मराशि होती हैं। वह नक्षत्र ही जन्म नक्षत्र कहलाता है।




Effect of constellation on human life




नक्षत्र के चार चरण में से जिस चरण पर जन्म होता है, चरण के अक्षर के अनुसार वह जन्माक्षर माना जाता है। उस अक्षर पर ही जन्म का नाम रखा जाता है। जन्म नक्षत्र के मालिक ग्रह की दशा ही जातक के जन्म समय की प्रथम महादशा कहलाती है।




नक्षत्र जन्म कुंडली का महत्वपूर्ण अंग है जन्म के समय नाम से जन्माक्षर से जन्म राशि का पता लग जाता है।  जन्म नक्षत्र से जातक के जन्म की पहली महादशा ज्ञात हो जाती है। चंद्रमा के सवा दो दिन में राशि परिवर्तन से पहला प्रभाव जातक के मानसिक पक्ष पर पड़ता है। इस प्रकार से जातक की मन की स्थिति, सोच, विचार, व्यवहार, खुशी, चिंता में प्रतिदिन अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, क्योंकि चंद्रमा जातक के मन एवं मस्तिष्क का संचालन करता है।




ज्योतिष विज्ञान में सताईस नक्षत्रों द्वारा मानव के भाग्यफल के अतिरिक्त उसकी मानसिकता, चारित्रिक गुण-दोषों एवं कार्यशैली की अभिव्यक्ति के लिए


1.नक्षत्र का चरण।


2.नक्षत्र का स्वामी ग्रह ।


3.अधिकृत अंग।


 4.राशि।


5.राशि के नक्षत्र का चरण।


6.महादशा का सूक्ष्मतम अध्ययन अनिवार्य होने के कारण प्रत्येक नक्षत्र के अपने गुण दोष होते हैं। उस नक्षत्र में जन्म लेने पर वह गुण दोष जातक में जन्म से ही आ जाते हैं। 



युवावस्था तक पूर्ण विकसित होने पर उनका जातक में पूर्ण प्रभाव दिखाई देने लगता है। शारीरिक पक्ष के साथ ही मानसिक पक्ष पर भी जन्म नक्षत्र और उसके चरण का प्रभाव पड़ता है। 




सताईस नक्षत्र मानव शरीर के सताईस अंगों के स्वामी माने गए हैं, गोचर में जब पापी और अशुभ ग्रह किसी नक्षत्र पर आते हैं, तो नक्षत्र से संबंधित अंग बीमारी से ग्रस्त और पीड़ित हो जाता है। जब उसी अंग पर शुभ एवं मित्र घर आते हैं, तो वही अंग स्वस्थ एवं पृष्ट हो जाता है।




इस प्रकार नक्षत्र मानव के शारीरिक एवं मानसिक पक्ष पर अपना प्रभाव रखते हैं। ज्योतिष-विज्ञान में नक्षत्र मानव शरीर की इकाई के समान है। जन्म लग्न के नक्षत्र का भी जातक के शरीर एवं मन पक्ष पर प्रभाव पड़ता है। मिथुन लग्न में मृगशिरा नक्षत्र (मंगल स्वामी) में जन्मे जातक पर मंगल के गुणों का प्रभाव अधिक होगा। 




गोचर फलादेश में भी ग्रह गोचर के अध्ययन के साथ ग्रह की राशि और नक्षत्र भी देखा जाता है। शत्रु नक्षत्र पर या मित्र नक्षत्र पर ग्रह गोचर फल का क्या प्रभाव है। इससे गोचर फल ज्ञात हो जाता है।




नक्षत्रों के आधार:-पर ही संवतसर, षड्ऋतु, महीना, पक्ष, सप्ताह, दिवस, तिथि आदि की गणना की जाती है। 




सताईस नक्षत्रों:-को तीन भागों में बाँटा सात्विक, राजसिक और तामसिक आदि हैं। तीनों वर्गों में जन्में जातकों के शारीरिक एवं मानसिक पक्ष पर नक्षत्र के स्वामी ग्रह का प्रभाव पड़ने से भिन्नता पाई जाती है। 


1.सात्विक नक्षत्र:-सतोगुणी नक्षत्रों की संख्या छः पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती। 




सात्विक नक्षत्र का फल:-सात्विक नक्षत्र में जन्में जातक सत्य से जुड़कर अच्छे कर्मों के द्वारा परम सत्ता के महासत्य से जुड़ने का निरन्तर प्रयास करते रहते हैं। कर्म का पालन करने वाले कुशलता या विज्ञानिक प्रणाली प्रणाली करना सांसारिक माया के भ्रम में लिप्त न होना, अंतर के सत्य में परम सत्ता को पहचानना, सात्विक गुणयुक्त व्यक्ति के लक्षण है। 


जन्म-मरण के बीच भौतिक वस्तुओं का उपभोग,शरीर धर्म का पालन करने के लिए करते हैं,उन पर आश्रित नहीं होते है। 




नक्षत्रस्वामीग्रहअधिकृत अंग
पुनर्वसुबृहस्पति नासिका
विशाखा बृहस्पतिह्रदय
पूर्वाभाद्रपद बृहस्पतिबांई जांघ
 अश्लेषाबुधकान
जेष्ठा बुध आमाशय 
 रेवतीबुधघुटने



2.राजसिक नक्षत्र:- राजसिक नक्षत्रों की संख्या नौ  कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, रोहिणी, हस्त, श्रवण, भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा।




राजसिक नक्षत्रों में जन्मे व्यक्तियों का फल:-राजसिक प्रवृत्ति के व्यक्ति भौतिक सुख साधनों का उपयोग करते हुए भौतिकवादी शैली से जीवन जीने जीते हैं। संसार और जीव जगत को ही सत्य मानते हैं।



अध्यात्म की दुनिया में विश्वास नहीं होता हैं। कला और  सौंदर्य को पसंद करने वाले, चित्रकला, संगीत को पसंद करने और वास्तुकला में रुचि रखने वाले होते है। मूर्ति के निर्माण में रुचि रखने वाले और नृत्य कला के पारखी होते हैं। कल्पना जगत में भ्रमण करते हुए कवि एवं साहित्य करने वाले बन जाते हैं उनकी महत्वाकांक्षाएं कभी समाप्त नहीं होती हैं सांसारिक कर्मों रीति-रिवाजों को ही धर्म मानकर परंपरागत विधि से उनका पालन करते रहते हैं। 



अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए उनका मन विकार युक्त भी हो जाता है। चालाक, धोखेबाज और  असत्य बोलने वाले, मान सम्मान की इच्छा रखने वाले और जीवन भर वस्तुओं का संग्रह करने में खुशी अनुभव करने वाले होते है। शान-शौकत से सही ढंग से जीवन व्यतीत करना पसंद करते हैं।




नक्षत्रस्वामीग्रहअधिकृत अंग
कृतिका सूर्य सिर
उत्तराफाल्गुनी सूर्य बायां हाथ
उत्तराषाढ़ासूर्यरीढ़ की अस्थि
 रोहिणीचन्द्रमा मस्तक
 हस्तचन्द्रमाअंगुलियां
 श्रवणचन्द्रमाकमर
 भरणी शुक्र पांव के तलवे
पूर्वाफाल्गुनी शुक्रदांया हाथ
 पूर्वाषाढ़ाशुक्रपीठ



3.तामसिक नक्षत्र:- तमोगुणी नक्षत्रों की संख्या बारह अश्वनी,मघा, मूल, मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा, पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद, आद्रा, स्वाति, शतभिषा आदि हैं। इन नक्षत्रों के स्वामी ग्रह क्रूर एवं पापी ग्रह कहलाते हैं।



तामसिक नक्षत्रों के फल:- इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाला व्यक्ति तामसिक प्रवृत्ति का होता है जो छल कपट करने में माहिर, अहंकारी, घमंड करने वाला, धन का घमंड करने वाला, हिंसक प्रवृत्ति का बहुत ही क्रोधी और किसी पर उपकार किया को मानने वाला नहीं होता है। बहुत ही स्वार्थी होता है, सत्ता और धन के लोभी होते हैं। 



इनकी जन्म कुंडली के पाप एवं प्रबल होने के कारण इन्हें अच्छे कार्य करने से रोकते हैं। पाप ग्रहों के दुष्प्रभाव से रास्ता भटक कर गलत या दुष्कर्म में फंसे रहते हैं।अस्थिर मन की सोच एवं गलत विचारशीलता  इनको हिंसा और अपराध के रास्ते पर ले जाते है।      




नक्षत्रस्वामीग्रहअधिकृत अंग
अश्विनीकेतुपांवो के ऊपर का भाग
मघाकेतुहोंठ
मूलकेतुकोख
मृगशिरामंगलभौंह
चित्रामंगलग्रीवा
धनिष्ठामंगलगुदा
पुष्यशनिचेहरा
अनुराधाशनिउदर
उत्तराभाद्रपदशनिपिंडली
आद्राराहुनेत्र
स्वातिराहुवक्षःस्थल
शतभिषाराहुदांई जांघ



ज्योतिष विज्ञान मानव के आचरण, चारित्रिक गुण-दोष एवं मनोवृतिओं में भिन्नता के कारण सुखी दांपत्य जीवन के लिए ग्रह नक्षत्रों एवं राशियों के आधार पर कुंडली मिलान के जो नियम शास्त्रों में बताए गये हैं उनका पालन करने से सुखी जीवन के जीने के साथ-साथ गुणवान संतान भी पैदा हो सकती हैं।

Sunday, 31 July 2022

July 31, 2022

ज्योतिष में वृक्ष पूजा क्यों की जाती हैं?(Why tree worship is done in astrology?)

Why tree worship is done in astrology?





ज्योतिष में वृक्ष पूजा क्यों की जाती हैं?(Why tree worship is done in astrology?):-सृष्टि को चलाने वाले मूल नियामक तथा संचालन शक्ति के द्वारा ही पृथ्वी पर सम्पूर्ण जड़ और चेतन पदार्थों का अस्तित्व रहता हैं। संसार में चारों ओर का वातावरण पेड़-पौधों के बिना अधूरा हैं, समस्त जगत में खुशहाली व आनन्द को प्रदान करने वाले पेड़-पौधे होते हैं, जिनके दर्शन व स्पर्श मात्र से ही मनुष्य को सुख व आराम की प्राप्ति होती हैं। पेड़-पौधों से प्राप्त होने मनुष्य की आवश्यकताओं के लिए उनकी सुरक्षा के लिए प्राचीन काल से ऋषि-मुनियों ने इनका सम्बन्ध किसी न किसी देवता से जोड़ा। जिससे मनुष्य इस प्रकृति के अमूल्य धरोहर की रक्षा करते रहे। पेड़-पौधों से प्राप्त होने वाली शुद्ध हवा पर मनुष्य का जीवन टिका हुआ। इसलिए मनुष्य को पर्यावरण की सुरक्षा करते हुए प्रकृति से प्रेम करना चाहिए। दूसरे मनुष्य को भी इस प्रकृति को बचाये रखने के लिए उनकी हिफाजत का संदेश देना चाहिए। जिससे प्रकृति में किसी भी तरह वातावरण की भौतिक, रासायनिक और जैविक अवस्था में परिवर्तन से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, जलचरों, वनस्पतियों अथवा भवनों आदि को हानि होने से बचाया जा सकें।




प्रकृति प्रेम ही पर्यावरण की सुरक्षा का मूल मंत्र है। इस मंत्र को जन-जन तक पहुंचाने, इसका आदर करने या यूं कहें कि प्रदूषण फैलने से रोकने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने वृक्षों-लताओं, पशु-पक्षियों आदि को न सिर्फ देवी-देवताओं का नाम दिया, बल्कि नवग्रहों को खुश करने के लिए इनकी पूजा करने व इन्हें चारा डालने की प्रथा या परम्परा भी बनाई।




प्राचीन मान्यताएं:-भारतीय समाज में पेड़-पौधों के बारे में अनेक मान्यताएं हैं।



पीपल वृक्ष के बारे में:-ऐसी मान्यता है की पीपल के वृक्ष पर 33 करोड़ देवी-देवता का निवास करते है। इसलिए मानव पीपल वृक्ष की पूजा अर्चना करते है। इसकी मूल वजह यह होता है कि पीपल का वृक्ष रात्रि को ऑक्सीजन छोड़ता है और कार्बनडाइऑक्साइड को ग्रहण करते है। जो ऑक्सीजन प्राणी जगत् के लिए वरदान है इसलिए इसे 'प्राण वायु' कहते है। अतः हमारे ऋषि-मुनियों पीपल वृक्ष की सुरक्षा के लिए न सिर्फ उस पर 33 करोड़ देवी-देवता का वास होना बताया, बल्कि मन्द ग्रह की शांति के लिए उसकी पूजा व परिक्रमा करने, उस पर धागा लपेटने आदि का विधान भी बनाया। इस वजह से इंसान पीपल वृक्ष को पूजते हैं और उसके काटने से डरते है।




विष्णु प्रिया पौधा के बारे में:-ऐसा कहा जाता है कि घर में वृन्दा या पृष्पसारा पौधा अवश्य लगाना चाहिए, क्योंकि इसे घर में लगाने से भगवान नारायण खुश होते हैं। घर में विष्णुप्रिया पौधा लगाने का कारण यह है कि भारत में वर्षा अधिक होती है, जिसकी वजह से मलेरिया भी अधिक होता है। मलेरिया का मूल कारण मच्छर होते है और वैज्ञानिकों ने साबित किया है, कि जिसके घर में विष्णुप्रिया पौधा लगा होता है, वहां पर मलेरिया का मच्छर नहीं पनपता है। अर्थात् विष्णुप्रिया पौधे की पूजा करने से मलेरिया से इंसान की व पूजा से विष्णुप्रिया के पौधे, दोनों की सुरक्षा हो जाती है।





वट वृक्ष के बारे में:-ऐसा कहा जाता है कि वट वृक्ष पर भूत-प्रेतों का निवास होता है। इसलिए घर के आसपास नहीं होना चाहिए। इसके पीछे मूल वजह यह है कि वट वृक्ष  बहुत ही घना होता है, अतः कोई व्यक्ति उस पर छिप सकता है तथा अंधेरा होने पर हानि पहुंचा सकता है।




प्रियंगु व वटवृक्ष के पत्ते चौड़े होते है। पत्तियों के चौड़े होने के कारण फोटोसिंथेसिस के लिए इन्हें बहुत अधिक मात्रा में जल की जरूरत होती है। अतः इनकी जड़े जल प्राप्त करने के लिए आसपास के भवनों के नीचे नींव को तोड़ती हुई दूर तक निकल जाती है और उसकी नींव कमजोर पड़ जाती हैं। इस वजह से भवन के आसपास इनको नहीं लगाना चाहिए,लेकिन इनसे मिलने वाली ऑक्सीजन से मानव वंचित नहीं रह जाये इसलिए इनकी पूजा करने,इनके नीचे अधिक समय तक रहने,इनके 108 चक्कर लगाकर सूत बांधने व अन्य कर्म करने का विधान बनाया गया है।




इनके अलावा विष्णुप्रिया, आंवला, नीम आदि को भी शुभ माना गया है। इस प्रकार प्रकृति की कोई भी वनस्पति अनुपयोगी नहीं है।




फलदार वृक्षों:-को आंगन में लगाना अशुभ माना गया है। इसकी वजह यह है कि फलों को तोड़ने के लिए बच्चे पेड़ पर चढ़कर गिर सकते है। पत्थर मारकर शीशे तोड़ सकते है।




बेल को भवन:-के पास लगाने की सलाह भी नहीं दी जाती हैं, क्योंकि इनके सहारे सांप, बिच्छू, रेंगने वाले कीड़े, चूहे आदि जहरीले जंतु घर में पहुचकर नुकसान पहुंचा सकते है।



दूध वाले पेड़:-भी अशुभ होते है, क्योंकि दूध जहरीला होता है और आंखों को कष्ट देता है।



शयनकक्ष में:-भी पौधे लगाने की सलाह नहीं दी जाती है, क्योंकि रात को कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिससे वहां रहने वालों का स्वास्थ्य बिगड़ता हैं।



भवन या परिसर में:-पोधों को उचित दिशा में लगाना भी अतिआवश्यक है। 



छोटे पौधे:-उत्तर, पूर्व व उत्तर-पूर्व में छोटे पौधे लगाना चाहिए, ताकि सूरज की रोशनी के मार्ग में कोई रुकावट न आए व सूरज से मिलने वाली ऊर्जा तथा विटामिन ए, डी आदि मानव को भरपूर मात्रा में मिल सके।



बड़े व विशाल वृक्षों:-को दक्षिण, पश्चिम व दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगाना चाहिए, ताकि मानव को दोपहर बाद भवन पर पड़ने वाली गर्म व हानिकारक किरणों से बच सकें।



पेड़ो की पूजा के पर्व:-ऐसे बहुत पर्व हैं जब पेड़ों की पूजा की जाती हैं।



◆वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती हैं।



◆गुरुवार के व्रत में भी कदली की पूजा करने का विधान है।



◆विष्णुप्रिया पौधे की पूजा भारतीय परिवारों में प्रतिदिन करने का विधान है।



◆विभिन्न शिवालय परिसरों में स्थित प्रियंगु के वृक्षों  को श्रद्धालु नियमित रूप से जल चढ़ाते हैं एवं उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

Tuesday, 12 July 2022

July 12, 2022

पसंदीदा रंगों से जानें इंसान अपना व्यक्तित्व(Know your personality from favorite colors)

Know your personality from favorite colors



पसंदीदा रंगों से जानें इंसान अपना व्यक्तित्व(Know your personality from favorite colors):-ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नौ ग्रह होते हैं, जो कि आकाश मण्डल में अपनी गति से परिक्रमा करते हुए इंसान के जीवन को प्रभावित करते हैं। यह नौ ग्रह के अलग-अलग रंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन ग्रहों के रंगों के द्वारा इंसान या पुरुषों-औरतों के व्यक्तित्व को जाना जा सकता हैं। जो इंसान जिस रंग को ज्यादा पसंद करता हैं, उस इंसान पर उस रंग से सम्बंधित ग्रह का प्रभाव पड़ता हैं। आदमियों-स्त्रियों की रुचि, मानसिकता एवं कार्य प्रणाली भी वैसी ही हो जाती है। रंगों की पसंद-नापसन्द के आधार पर यह जान सकते है कि आदमियों-स्त्रियों पर किस ग्रह का प्रभाव होगा।




1.सुनहरी या चमकीला पीला रंग पसन्द करने वालों पर सूर्य ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग सुनहरी या चमकीला पीला हैं, तो उन पर सूर्य ग्रह का प्रभाव अधिक होगा। वें अपने नियमों का पालन करने वाले, अपने नियमों से समझौता नहीं करने वाले, किसी के नीचे में काम करना पसंद नहीं करने वाले व नहीं किसी का हुक्म या उपदेश को सुनना पसन्द नहीं करते हैं। अपने दोस्तों का भी भला सोचने वाले और मददगार होते हैं। 




2.सफेद या हल्का आसमानी रंग पसन्द करने वालों पर चन्द्रमा ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग सफेद या हल्का आसमानी है, तो उन पर चन्द्रमा ग्रह का अधिक प्रभाव होगा। यह मन की कल्पना में खोये रहने वाले, किसी पर भी दया भाव रखने वाले और अपनी भावना से भावुक रहने वाले होते है। यें जल्दी चिंता करने वाले, किसी पर भी शंका करने वाले, अपना निर्णय लेने में परेशानी तथा जल्दी-जल्दी निर्णय बदलने वाले होते हैं। यह अच्छे कला करने वाले, अच्छे चित्र बनाने वाले और अच्छे लेख लिखने वाले बन सकते हैं।




3.गहरा लाल या रक्त के समान रंग पसन्द करने वालों पर मंगल ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग गहरा लाल या रक्त के समान है, तो उन पर मंगल ग्रह का प्रभाव होगा। ये हर काम को जल्दी करने के लिये उतावल करने वाले, अपने कार्य का हाथों-हाथ या फौरन सफलता चाहने वाले और शौर्य व साहस से खतरों के द्वारा कार्य करना पसंद करते है।




4.हरा रंग पसन्द करने वालों पर बुध ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग हरा रंग है, तो उन पर बुध ग्रह का प्रभाव होगा। ये चतुर, बुद्धिमान अथवा गणना के सम्बन्धी कामों को पसन्द करने वाले, एक ही काम या जगह से जल्दी उकता जाने वाले, अकेले या बिना मतलब बैठना पसन्द नहीं करने वाले और नए काम करना या दोस्त बनाना पसन्द करने वाले हो सकते हैं।




5.पीला या हल्का पीला भूरा रंग पसन्द करने वालों पर गुरु ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग पीला या हल्का पीला भूरा है, तो उन पर गुरु ग्रह का प्रभाव होगा। यह किसी भी विषय के बारे में उसकी जड़ तक को खोजने वाले, किसी दूसरे को बोलने नहीं देने वाले, पढ़ना, सोचना और अपनी मर्यादा में रहकर कार्य करने वाले हो सकते हैं। बड़े-बुजुर्गों एवं ज्ञानियों के पास रहकर ज्ञान या अच्छी बातें सिखना पसन्द होता हैं।




6. छींटदार, रंग-बिरंगा एवं चितकबरा रंग पसन्द करने वालों पर शुक्र ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग छींटदार, रंग-बिरंगा एवं चितकबरा है, तो उन पर शुक्र ग्रह का प्रभाव होगा। इनके चेहरे पर हमेशा खुशी के भाव झलकते हैं,  खुश रहने के मिजाज वाले, घूमने-फिरने, गीत-संगीत एवं अपना रौब झाड़ने वाले किसी भी बात को बढ़ा-चढ़ा करने वाले होते हैं।




7.नीला, काला या धुंधले गहरे रंग पसन्द करने वालों पर शनि व राहु-केतु ग्रह का प्रभाव:-यदि पुरुषों-औरतों का पसंदीदा रंग नीला, काला या धुंधले गहरे है, तो उन पर शनि व राहु-केतु ग्रह का प्रभाव होगा। यह ज्यादा भीड़-भाड़ से दूर रहकर एकांत में रहना पसंद करने वाले, बहुत ही मेहनत करने वाले और किसी भी काम को पूरी तरह से विश्वास के साथ करने वाले एवं दर्शन शास्त्र के जानकार हो सकते हैं।



 


ग्रहों के रंगों से व्यक्तित्व पर प्रभाव 


क्रम संख्या ग्रह रंग
1. सूर्य सुनहरी, चमकीला पीला, नारंगी
2. चन्द्रमासफेद, हल्का आसमानी
3. मंगल रक्तवर्णी, गहरा लाल
4. बुध हरा, मूंग के समान
5. गुरु पीला, हल्का पीला, भूरा
6. शुक्र रंग-बिरंगा, चितकबरा
7. शनि गहरा नीला, काला
8 राहु-केतु गहरा नीला, काला, धूम्रवर्णी

Monday, 20 June 2022

June 20, 2022

कन्या के शीघ्र विवाह और मनचाहा पति पाने के उपाय (Remedies for early marriage of girl child and getting desired husband)

                     Remedies for early marriage of girl child and getting desired husband

          




कन्या के शीघ्र विवाह और मनचाहा पति पाने के उपाय (Remedies for early marriage of girl child and getting desired husband):-प्रत्येक माता-पिता को जब लड़की या कन्या जवान हो जाती हैं, तो उनको अपनी लड़की के विवाह की चिंता सताने लग जाती हैं, की लड़की का विवाह समय पर व उत्तम घराने में हो जायें। प्रत्येक माता-पिता की चाहत होती हैं, लड़की या कन्या को सुन्दर व सुयोग्य पति मिल जावें और उसकी गृहस्थी में किसी भी तरह की रुकावट या बाधा नहीं आवें। जैसे-जैसे लड़की या कन्या की उम्र बढ़ती जाती हैं, तब उनको और चिंता होने लगती हैं। वे अपने करीबी व दूर के रिश्तेदारों को अपने लड़की या कन्या के लिए सुयोग्य वर की खोज करने के लिए कहते हैं। इस लड़कियों के लिए सुयोग्य एवं अच्छे संस्कारी पति को खोजने में बहुत ही दिक्कतों को झेलना पड़ता हैं। इसी चक्कर में और ग्रहों के बुरे प्रभाव में लड़कियों का विवाह समय पर नहीं हो पाता हैं और उनको सुयोग्य वर की प्राप्ति नहीं हो पाती हैं। इस तरह की प्रवृत्ति का कारण लड़की की जन्मकुंडली में स्थित ग्रहों का बुरे प्रभाव होना होता हैं। लड़की का विवाह समय पर नहीं होने के कारणों को प्राचीन काल के ज्ञाताओं ने जन्म कुण्डली में स्थित ग्रहों व भावों की बुरी स्थिति में होने के कारण माना हैं, जन्मकुण्डली में बनने वाले देरी से विवाह के कारणों को उन्होंने बताया हैं। उन कारणों को जानकर उनका समाधान करके लड़की का शीघ्र विवाह करवा सकते हैं।  





जल्दी विवाह का समय:-जिन लड़कियों की जन्मकुंडली के सप्तम भाव पर अच्छे ग्रह के द्वारा देखा जाता है और अच्छे ग्रह सप्तम भाव में बैठे होते हैं।





विवाह कारक शुक्र ग्रह जन्म कुण्डली में मजबूत व बलवान हो, तो




अथवा जब लड़की की उम्र अठारह से बीस वर्ष के आसपास हो जाएं और उस समय उनकी जन्मकुण्डली में शुक्र ग्रह की महादशा-अंतर्दशा चल रही होती है, उनके विवाह में किसी भी तरह की रुकावट नहीं आती हैं और समय पर विवाह होकर सुयोग्य पति मिल जाता है।

 



लड़कियों का समय पर विवाह व पति का नहीं मिलने के कारणों के लिए हमे आज से कुछ वर्षो पूर्व की सामाजिक व्यवस्थाओं-मान्यताओं को देखना पड़ेगा। उस समय संयुक्त परिवार प्रथा व जजमानी प्रथा हुवा करती थी। (इसमें राव-भाट घर का पण्डित आते थे)। ये लोग जजमान के लड़के के लिए लड़की व लड़की के लिए लड़का की खोज का काम करते थे।




आधुनिक समय में व्यक्तियों की एकल चलो प्रवृत्ति होने से जजमानी प्रथा समाप्त हो गए है।




विलंब या देरी से विवाह होना के कारण:-जिन लड़कियों या कन्याओं की जन्मकुंडली के सप्तम भाव और सप्तमेश दोनों ही बुरे ग्रहों के प्रभाव आकर कमजोर स्थिति में होते हैं।




मांगलिक योग के कारण विवाह में देरी होना:-लग्न कुण्डली व चन्द्रकुण्डली के लग्न या पहला भाव, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कोई भी भाव में कोई भी पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) बैठा होने पर पति प्राप्ति में देरी होती है, क्योंकि ऐसी जन्मकुण्डली को मांगलिक कुण्डली कहते है। मांगलिक लड़कियों का विवाह देरी से ही होता है।



 

विलंब या देरी से विवाह होना का समय:-जिन लड़कियों की जन्मकुंडली में मांगलिक योग या दोष बनता हैं, उनके विवाह में देरी होती हैं, इस तरह उचित समय पर विवाह न होकर लड़की के 25, 27, 29, 31, 33 या 35 वर्ष तक कि उम्र के आसपास तक विवाह हो पाता हैं, जिससे उनको आत्मग्लानि होने लगती हैं और अपने गृहस्थी जीवन का अच्छी तरह से आनन्द नहीं ले पाती हैं।




लड़कियां शीघ्र विवाह और सुयोग्य पति पाने हेतु करें उपाय:-जिन लड़कियों की उम्र ढलती जा रही हैं और उनकी शादी में देरी हो रही हैं, उनको अपनी शादी जल्दी करवाने और अपने लिए सुयोग्य पति की कामना की पूर्ति के हेतु निम्नलिखित उपाय को करना चाहिए-




★मां भगवती (पार्वती) का हमेशा पूजा करने से या प्रत्येक प्रदोष को पूरा श्रृंगार के साथ विधिपूर्वक पूजा करना चाहिए। पूजा के समय निम्न मन्त्र की पांच माला का जाप करने से लड़कियों को सुयोग्य पति की जल्दी प्राप्ति होती हैं।




★कात्यायनी देवी या पार्वती देवी की फोटो को सामने रखकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करना चाहिए और निम्न मंत्रो की एक माला का हमेशा जाप करने से लड़कियों को जल्दी एवं सुंदर पति की प्राप्ति होती है।




"कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।


नन्दगोपसुतं देवि पतिं में कुरु ते नमः।।'




★तुलसी के पौधे का हमेशा विधिपूर्वक पूजन करके उसके सामने बैठना चाहिए। उसके बाद नीचे लिखे मन्त्र की एक माला का जाप करना चाहिए। फिर तुलसी की 12 बार परिक्रमा करनी चाहिए। प्रत्येक परिक्रमा में दूध और पानी से सूर्य भगवान को अर्ध्य देते हुए नीचे लिखे मन्त्र का जाप करने से उत्तम पति की प्राप्ति जल्दी होती हैं।




"ऊँ देवेन्द्राणी नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रियभामिनी।


विवाहं भाग्य मारोग्यं शीघ्र लाभं च देहिमे।।"




विवाह कारक शुक्र को बल देने:-के लिए निम्नलिखित विधि करना चाहिए:




1.लड़की के हाथ से दो शीशियां बराबर आकार की लेकर एक शीशी में गंगाजल और दूसरी शीशी में कच्चा दूध लेकर उन दोनों शीशियों को भर देना चाहिए।




2.दूध से भरी शीशी को किसी एकांत सुनसान जगह पर गाड़ देना चाहिए। उस जगह पर किसी मानव का पैर नहीं पड़े ऐसी जगह होनी चाहिए। दूसरी गंगाजल से भरी शीशी को हरे-भरे या खेत-बगीचा में गाड़ देना चाहिए 




3.दोनों शीशियों को एक ही दिन में सूर्य उदय से सूर्य अस्त के बीच में गाड़ने का काम करना चाहिए।




ऊपर वाली विधि एवं मंत्रों में जितना विश्वास एवं आस्था होगी, उतनी ही जल्दी काम सफल होगा इस विधि को गुप्त रूप से करना चाहिए और किसी को नहीं बताकर व बिना किसी टाल-मटोल से करना चाहिए।