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Saturday, 27 August 2022

August 27, 2022

भीष्म अष्टमी पर्व व्रत का महत्व क्यों?(Why is the importance of Bhishma Ashtami Parv Vrat?)


भीष्म अष्टमी पर्व व्रत का महत्व क्यों?(Why is the importance of Bhishma Ashtami Parv Vrat?):-माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली अष्टमी को 'भीष्माष्टमी' के नाम से जाना जाता हैं। भीष्माष्टमी के रूप में प्रसिद्ध है। भीष्म पितामह की तरह गुणवान व आज्ञाकारी पुत्र की प्राप्ति एवं समय से पूर्व मृत्यु से बचने के लिए अष्टमी तिथि को पर्व के रूप में मानते हैं और व्रत रखा जाता हैं। इस अष्टमी तिथि को जीवनभर अपने पिता की आज्ञा एवं वचन पर कायम रहते हुए पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले भीष्म पितामह के द्वारा सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्याग के रूप में उनको याद करने के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। 




Why is the importance of Bhishma Ashtami Parv Vrat?




भीष्म अष्टमी पर्व व्रत पूजा-विधि(Bhishma Ashtami festival vrat puja vidhi):-निम्नलिखित रूप से करना चाहिए-




◆मनुष्य को प्रातःकाल जल्दी उठना चाहिए।






◆फिर अपनी दैनिकचर्या को पूर्ण करते हुए किसी भी पवित्र जल स्त्रोत में स्नान करते हुए उनको अपने पितरों के नाम से जल चढ़ाना चाहिए।




◆इस दिन प्रत्येक हिन्दू को भीष्म पितामह के निर्मित कुश, तिल, जल लेकर तर्पण करना चाहिए।




◆इस व्रत के करने से साल भर के पाप नष्ट हो जाते है।




◆व्रत करने वालों को सुंदर और गुणवान संतति प्राप्त होती है।




भीष्म अष्टमी व्रत की पौराणिक कथा:-बहुत समय पूर्व की बात है, एक हस्तिनापुर नाम का राज्य था। हस्तिनापुर राज्य पर शान्तनु नाम के राजा राज करते थे। राजा शान्तनु के पुत्र थे। देव नदी भगीरथी श्री गंगाजी इनकी माता थी। बाल्यकाल में इनका नाम देवव्रत था। उन्होनें देवगुरु बृहस्पति से शास्त्र तथा परशुरामजी से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी। उनके समकालीन शस्त्र-शास्त्र का इनके जैसा कोई ज्ञाता नहीं था। वीर होने के साथ-साथ वे सदाचारी और धार्मिक थे। सब प्रकार से योग्य देखकर महाराज शान्तनु ने उन्हें युवराज घोषित कर दिया।






एक बार महाराज शान्तनु की इच्छा शिकार करने की हुई तो उन्होंने अपने दरबारीओं से कहा कि मेरी आज इच्छा शिकार खेलने की हो रही है। इसलिए मैं आज अपने सैनिकों के साथ शिकार खेलने के लिए जा रहा हूँ। जब महाराज शान्तनु शिकार खेलने के लिए जंगल में जाते है तो शिकार खेलते-खेलते जंगल में अपने सैनिकों से बहुत दूर निकल जाते है। इस तरह जंगल भटकते-भटकते उनको प्यास लगती है। तब वे नदी को ढूंढते-ढूंढते हुए जब नदी दिखाई देती है तो उनको एक सुंदर स्वरुप वाली आकर्षक कन्या दिखाई देती है और उसके पास जाकर अपनी प्यास के लिए पानी मांगते है।






पानी पिलाने पर उस कन्या का परिचय महाराज शान्तनु पूछते है, तब वह कन्या अपना परिचय देते हुए बताती है, की मेरा नाम मत्स्य गंधा है और मैं एक विषाद कन्या हूँ। ऋषि पाराशर जी के वरदान से मैं अपूर्व लावण्यवती हो गई थी। मत्स्य गंधा के शरीर से कमल की सुंगध निः सृत हो रही थी। जो एक योजन तक जाती थी। महाराज शान्तनु उनके रूप लावण्य के आकर्षण पर मुग्ध हो गए। महाराज शान्तनु पहली नजर में उसे देखते ही उस रूप यौवन पर मोहित होकर उससे अपनी मन चाहत को मत्स्यगंधा को कहा-कि हे देवी मैं आपके सौंदर्य रूप से आकर्षित हो गया हूँ और मैं आपके प्रेम का सुख भोगने के इच्छुक हूँ। मैं हस्तिनापुर का महाराज शान्तनु हूँ। मैं आपसे लग्न करने का इच्छुक हूँ। इसलिए आप कृपा करके मेरे प्रेम को स्वीकार करे।






तब मत्स्यगंधा ने कहा-हे राजन आप तो एक राज्य के राजा हो और मैं ठहरी एक विषाद कन्या हूँ। मैं तो आपसे लग्न करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन मेरी पिताश्री की अनुमति इस लग्न को करने के लिए चाहिए। इसलिए आप कृपा करके मेरे पिताश्री से अनुमति मांगे। जब उनकी स्वीकृति मिल जाएगी।तो मैं आपसे विवाह कर लुंगी। इस तरह महाराज शान्तनु मत्स्यगंधा के पिताश्री निषादराज से मिले और अपना परिचय दिया। परिचय देने के बाद निषादराज से उनकी पुत्री मत्स्यगंधा से विवाह करने की याचना की और कहा कि मैं आपकी पुत्री मत्स्यगंधा को पहली नजर में देखने के बाद उसके रूप यौवन से मोहित हो गया,इसलिए मैं आपकी पुत्री को आपनी पत्नी बनाने का इच्छुक हूँ। आप कृपा करके मुझे आपकी पुत्री मत्स्यगंधा से विवाह की अनुमति देवे।






तब निषादराज बोले-हे राजन आप तो हस्तिनापुर के राजा है। मैं तो एक निषाद हूँ, और मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके साथ करवाने की स्वीकृति देता हूँ। लेकिन मेरी एक शर्त है,की मेरी पुत्री से उत्पन्न सन्तान पुत्र ही आपके राज्य हस्तिनापुर का राजा आपके बाद बनने का अधिकारी होगा।यह आप वचन देवे तो मैं अपनी कन्या का विवाह आपसे करवाने के लिए तैयार हूँ। इस तरह की शर्त को सुनकर महाराज शान्तनु उदास और दुःखी हो गये। वे राजकुमार देवव्रत का अधिकार अपने स्वार्थ के लिए छीनना नहीं चाहते थे और उसके अधिकार को दूसरे को देना गलत समझते थे। इस तरह की बात के बाद महाराज शान्तनु अपने राज्य वापस आ गये। वे अपने राज्य में गुमसुम रहने लगे और मत्स्यगंधा को अपने दिल से नहीं निकाल पा रहे थे। इस तरह महाराज शान्तनु मत्स्यगंधा की याद में तड़पते हुए दिनोदिन सूखते जा रहे थे, जिसके परिणाम स्वरूप वें बीमार हो गये।






देवव्रत ने अपने पिता महाराज की इस तरह की हालत देखकर दुःखी होकर उनसे उनके दुःख का कारण पूछा। काफी विनती करने पर महाराज शान्तनु ने अपने दिल के हाल को अपने पुत्र देवव्रत को बताया। जब देवव्रत को अपने पिताश्री की उदासी और बीमारी का कारण पता चलने पर अपने पिता को वचन दिया कि मैं आपकी खुशी के लिए अपना अधिकार छोड़ने के लिए तैयार हूँ और मैं वचन देता हूँ कि मैं भविष्य में इस राज्य हस्तिनापुर पर अपना अधिकार नहीं करूंगा। आपकी इच्छा पूर्ति के लिए मैं अभी तुरन्त निषादराज के पास जाता हूँ।






देवव्रत इस तरह-अपने पिताश्री को सांत्वना देकर जंगल के लिए चल पड़े। जब वे निषादराज के पास पहुंचे तब उन्होंने अपना परिचय दिया कि मैं शान्तनु पुत्र देवव्रत हूँ। मैं आपसे निवेदन करता हु की आप अपनी कन्या मत्स्यगंधा जी का विवाह मेरे पिताश्री से करने की अनुमति देवे।






निषादराज ने कहा-कि मेरी शर्त यह कि तुम महाराज शान्तनु की बड़ी सन्तान हो और तुम्हारे बड़े होने राज्य पर तुम्हारा अधिकार होगा। मैं ठहरा निषाद और मेरी पुत्री को सम्मान नहीं मिलेगा। इसलिए मेरी शर्त है कि तुम अपना राज्य अधिकार को छोड़ दो और मुझे व मेरी पुत्री को वचन दो की जब मेरी पुत्री के पुत्र सन्तान होगी। तो वही पुत्र सन्तान राज्य का उत्तराधिकारी होगा। देवव्रत ने हाथ में जल लेकर कहा-कि मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूं कि मैं राज्य सिंहासन पर नहीं बैठूंगा।






तब निषादराज ने कहा-कि आप तो राज्य के सिंहासन पर नहीं बैठेंगे, लेकिन आपका पुत्र मेरे दोहीत्रों से राजसिंहासन छिन सकते है। इस तरह के निषादराज के वचन सुनकर राजकुमार देवव्रत ने सभी दिशाओं की ओर देवताओं को गवाह मानकर आजीवन ब्रह्मचारी रहने और विवाह न करने की भीषण प्रतिज्ञा की। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम "भीष्म" पड़ा। अपने पिता के सुख के लिये इतने बड़े व्रत को निभाने वाले आजीवन बाल ब्रह्मचारी भीष्म का चरित्र सबके लिए अनुकरणीय है। देवव्रत ने आजीवन अविवाहित रहते हुए बिना सन्तान के ही मृत्यु की अवस्था प्राप्त की थी। इसलिए राजकुमार देवव्रत के अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत के कारण सम्पूर्ण हिन्दू समाज माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन पुत्रों की भांति तर्पण करते है और करना चाहिए।






भीष्म अष्टमी व्रत का महत्व(importance of Bhishma Ashtami Vrat):-भीष्म अष्टमी व्रत के द्वारा मनुष्य अपने पिता के प्रति कर्तव्य को पालन करने में मददकारी होता हैं। पिता के समान कोई नहीं होता हैं, उनकी आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए अपनी पितृभक्ति को जागृत करना चाहिए।






◆पितरों का तर्पण हो जाने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता हैं।




◆इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के द्वारा जीवन के बुरे कर्मों से मुक्ति मिल जाती हैं। 




◆मनुष्य के द्वारा यह व्रत करने पर गुणवान व आज्ञाकारी पुत्र सन्तान की प्राप्ति होती हैं।




◆मनुष्य की अकाल मृत्यु से भी यह व्रत रक्षा करता हैं।

Sunday, 14 August 2022

August 14, 2022

कोजागर पूर्णिमा व्रत विधि, कथा और महत्व (Kojagar Purnima Vrat vidhi, katha and Significance)

                 Kojagar Purnima Vrat vidhi, katha and Significance




कोजागर पूर्णिमा व्रत विधि, कथा और महत्व (Kojagar Purnima Vrat vidhi, katha and Significance):-कोजागर पूर्णिमा व्रत का धन की देवी माता लक्ष्मीजी को खुश करने का प्रमुख व्रत होता है, जिससे माता लक्ष्मीजी का आशीर्वाद प्राप्त हो सके और सुख-सम्पत्ति एवं वैभव-ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सके।



कोजागर पूर्णिमा व्रत आश्विन मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को किया जाता हैं। आश्विन पूर्णिमा मास को भगवती महालक्ष्मी रात्रि के समय यह देखने के लिए घूमती हैं, की कौन जाग रहा है। जो जाग रहा हैं, उसे धन देती हैं। लक्ष्मीजी के "कोजागृति" कहने के कारण इस व्रत का नाम कोजागर पड़ा।





कोजागर व्रत की विधि:-कोजागर व्रत को विधि के अनुसार करने पर मनुष्य को जीवनकाल में अच्छे नतीजों की प्राप्ति होती हैं, कोजागर व्रत की विधि इस तरह है:



◆इस व्रत में निशीध व्यापिनी पूर्णिमा ग्रहण करनी चाहिए तथा ऐरावत पर आसठ इन्द्र और महालक्ष्मी का पूजन करके उपवास करना चाहिए।



◆रात्रि के समय घृतपूरित और गन्ध, पुष्पादि से पूजित एक सौ आठ या यथा शक्ति इससे भी अधिक दीप को प्रज्ज्वलित करके देव-मन्दिरों, बाग-बगीचों, तुलसी, अश्रत्थ वृक्षों के नीचे तथा भवनों में रखना चाहिए।



◆प्रातःकाल होने पर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्रों को पहनकर इन्द्र देव का पूजन करना चाहिए।



◆उसके बाद में ब्राह्मणों को घी-शक्कर मिश्रित खीर का भोजन करना चाहिए।



◆फिर अपने सामर्थ्य के अनुसार मनुष्य को ब्राह्मणों को अच्छे वस्त्रों को देना चाहिए।


◆सामर्थ्य के अनुरूप ही ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उनको सन्तुष्ट करके विदा करना चाहिए।


◆इसके साथ में स्वर्ण के दीपक देने से अनन्त फल की प्राप्ति होती हैं।



◆इस दिन श्रीसूक्त लक्ष्मी स्तोत्रं का पाठ ब्राह्मण द्वारा करवाना चाहिए।



◆ब्राह्मणों के द्वारा इस दिन कमल गट्टा, बेल, पंचमेवा अथवा खीर द्वारा दशांग हवन करवाना चाहिए।




कोजागर व्रतं की पौराणिक कथा:-बहुत समय पूर्व की बात है, एक मगध नाम का देश था। उस मगध देश में वलित नामक एक अधाचक्रवादी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम चण्डी था, वह बहुत कर्कशा थी। वह ब्राह्मण को रोज ताने देती की मैं किस दरिद्र के घर आ गई हूँ। वह सम्पूर्ण लोक में अपने पति की निन्दा किया करती थी। पति के विपरीत आचरण करना ही उसने अपना धर्म बना लिया था। वह पापिनी रोज अपने पति को राजा के यहां से चोरी करके धन लाने को उकसाया करती थी।




एक बार श्राद्ध के समय उसने पिण्डों को उठाकर कुऐं में फेंक दिया। इससे अत्यन्त दुःखी होकर ब्राह्मण जंगल में चला गया। जहां उसे नाग-कन्याऐं मिली। उस दिन आश्विन मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि थी। नाग-कन्याओं ने ब्राह्मण को रात्रि जागरण कर लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने वाला "कोजागृति व्रत" करने को कहा। कोजागर व्रत की विधि को जानकर उस ब्राह्मण ने अपने पूर्ण विश्वास एवं श्रद्धा से व्रतं का संकल्प किया और पूर्ण विधिपूर्वक उसने समस्त पूजा सामग्री को इकट्ठा करके लक्ष्मीजी की पूजा विधि की थी।




उसके बाद में उसने रात्रिकाल में सोया नहीं था। जब माता लक्ष्मीजी रात्रिकाल में घूमने निकलती हैं, की तब माता लक्ष्मीजी उस ब्राह्मण को जागरण करते देखती हैं। तब उस पर खुश होकर पूछती है। हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही प्रसन्न हूँ। कोई भी वरदान मांग। तब गरीब ब्राह्मण माता लक्ष्मीजी को देखकर बहुत ही खुश होता है और कहता है कि माता आप तो सबकुछ जानती हो। आप अपने अनुसार जो कुछ भी देना चाहती हो, वह मुझे दे दीजिए। इस तरह माता ने उसके मन की इच्छा के अनुसार उसको वरदान देकर अदृश्य हो गई। इस तरह कोजागर व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण के पास अतुल धन सम्पत्ति हो गई। भगवती लक्ष्मी की कृपा से उसकी पत्नी चण्डी की भी मति निर्मल हो गई और वे दम्पत्ति सुखपूर्वक रहने लगे। इस तरह कोजागर व्रत की शुरुआत हो थी और आज भी चलन में हैं।



कोजागर व्रत के फल:-माता लक्ष्मीजी को खुश करने का बढ़िया उपाय है, इस व्रत के फल इस तरह हैं:



◆कोजागर व्रत करने से मनुष्य पर माता लक्ष्मीजी खुश होकर धन-सम्पदा प्रदान करती है, जिससे मनुष्य की आर्थिक स्थिति ठीक हो जाती हैं।



◆मनुष्य को धन-सम्पत्ति की प्राप्ती होने से मानसिक शांति की प्राप्ति होती हैं।



◆इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को शारीरिक व्याधियों से मुक्ति मिलती हैं।



◆मनुष्य के दाम्पत्य जीवन में गृह-क्लेश से छुटकारा मिलता है और घर के अन्दर सुख-शांति बनी रहती हैं।



◆इस व्रत को करने से मनुष्य को उत्तम पति या पत्नी की प्राप्ति होती हैं।



◆इस व्रत के असर से मनुष्य अपने जीवनकाल में भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने में सफल होता हैं।


Saturday, 30 July 2022

July 30, 2022

गणेश या कलंक चतुर्थी को चंद्र दर्शन दोष क्यों?

(Why Chandra Darshan Defects Ganesha or Kalank Chaturthi

             



गणेश या कलंक चतुर्थी को चंद्र दर्शन दोष क्यों?(Why Chandra Darshan Defects Ganesha or Kalank Chaturthi):-भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को सिद्धि विनायक चतुर्थी के नाम से जानी जाती हैं। चतुर्थी तिथि के दिन गणेश जी जन्म तिथि मानी जाती हैं, इस तिथि के दिन ही चन्द्रमा को शाप गणेशजी के द्वारा मिला था। जब गणेशजी की तोंद को निकला हुआ देखा तो चन्द्रमा ने गणेशजी की हंसी उड़ाई थी, जिसके फलस्वरूप गणेशजी ने चन्द्रमा को शाप दिया कि तुम एकदम रोशनी हीन हो जाओगे और तुमको आज से तुम्हें जो कोई भी देखेगा उसे पाप और मिथ्या कलंक लगेगा। इसलिए इस चतुर्थी तिथि को कलंक चतुर्थी तिथि भी कहते हैं। इस तरह चन्द्रमा को अपनी सुंदरता पर घमंड का फल मिला था। उसके बाद चन्द्रमा ने कठोर तपस्या गणेशजी की तब जाकर गणेशजी खुश होकर चन्द्रमा को वरदान दिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को ही यह तुम्हारे दर्शन करने पर दोष रहेगा, यदि कोई इस तिथि को दर्शन कर लेने पर जो भी मेरी पूजा करेगा वह इस दोष से मुक्त हो जायेगा।




भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन करने योग्य कार्य:-निम्नलिखित करने योग्य कार्य हैं-


◆भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन मनुष्य को प्रातःकाल जल्दी उठना चाहिए।


◆भगवान गणेशजी के नाम से संकल्प लेना चाहिए।


◆इस दिन मनुष्य को भगवान गणपति जी के लिए उपवास करना चाहिए।


◆इस दिन मनुष्य को गणेशजी की विधिवत पूजा करनी चाहिए।


◆उसके बाद ही अपने उपवास को छोड़ना चाहिए।


◆इस दिन जो उपवास गणेशजी के नाम पर किया जाता है उस उपवास से गणेशजी खुश होकर व्रत करने वाले व्रती पर अपनी अनुकृपा कर देते हैं।


◆इस दिन जो मनुष्य सपने सामर्थ्य के अनुसार दान देते है और गरीबो की मदद करते है तो इस दिन जो भी दान और दूसरों के प्रति किये गए कार्य से गणपति खुश होते है।


◆इस व्रत के प्रभाव स्वरूप मनुष्य को गणेशजी की कृपा से सौ गुणा प्राप्त होती है।



भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन निषेध:-इस दिन चन्द्र दर्शन करने से किसी भी तरह से बचने की कोशिश करते हुए चन्द्रमा के दर्शन को नहीं करना चाहिए। इस दिन चन्द्रमा के जो भी दर्शन करते है उनको झूठा कलंक को भोगना पड़ता हैं। इस विषय में हिन्दू धर्म शास्त्रों में बताई गई है कि मिथ्या कलंक श्रीकृष्णजी भगवान को भी भोगना पड़ा था।



गणेश चतुर्थी को चन्द्र दर्शन दोष से बचाव:-जिस तरह चन्द्रमा अपनी देह को सुंदर और आकर्षक मानकर अपने आप को सबसे सुंदर मानता है, जो भी इस भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को दर्शन करता है, तो उसको मिथ्या कलंक को भोगना पड़ता है। 


◆यदि किसी को किसी भी कारण से चन्द्रमा के दर्शन हो जाते है, तो उनको यह मंत्र का पाठ करना चाहिए, जो इस तरह है:


सिंह प्रसेनमवधीत्सिहो जाम्बवता हतः।


सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक।।


इस मंत्र का पाठ करने से भी चन्द्रदर्शन के अशुभ प्रभाव एवं झूठे कलंक के दोष से मुक्ति मिलती है और


◆ साथ ही निम्नलिखित कथा जो श्रीकृष्णजी को भी चन्द्र दर्शन के कारण भोगनी पड़ी थी, उस कथा को भी सुनना चाहिए। जिससे चन्द्र दर्शन करने के मिथ्या कलंक से बचा जा सके।


भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रदर्शन विषय की पौराणिक कहानी:-बहुत पहले समय में द्वापरयुग का समय था। उस युग में एक सत्राजित् नाम का यदुवंशी निवास करता था। वह भगवान सूर्य देव की नियमित आराधना करता है और सूर्य भगवान में प्रति उसकी पूर्ण आस्था थी। उसकी भक्ति से खुश होकर भगवान सूर्य देव ने उसे स्यमन्तक नाम की मणि दी। जो सूर्य देव की तरह ही प्रकाशवान एवं क्रांतिमान थी। वह मणि प्रतिदिन आठ भार अर्थात् (आठ भार का मतलब है कि मणि के समान आठ भार) सोना देती थी तथा उसके प्रभाव से सम्पूर्ण राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि, सर्प, अग्नि, चोर और दुर्भिक्ष आदि का डर नहीं रहता था। एक दिन सत्राजित् उस मणि को धारण करके राजा उग्रसेन की सभा में आया।


उस समय मणि की क्रांति से वह दूसरे सूर्य की तरह ही प्रतीत दिखाई दे रहा था। भगवान श्रीकृष्णजी की इच्छा थी कि यदि यह ध्वय रत्न राजा उग्रसेन के पास होता तो सारे राष्ट्र का कल्याण होता, उधर सत्राजित् को मालूम हो गया कि श्रीकृष्णजी मेरी मणि ले लेना चाहते हैं। अतः उसने वह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। एक दिन प्रसेन उस मणि को गले में बांधकर घोड़े में पर सवार होकर आखेट के लिए गया और वहां एक सिंह के द्वारा मारा गया। प्रसेन के न लौटने पर यादवों में काना-फूसी होने लगी कि श्रीकृष्णजी ने मणि को पाने के लिए प्रसेन को मार कर मणि प्राप्त कर ली होगी। उधर वन में मुहँ में मणि दबाये हुए सिंह को ऋक्षराज जाम्बवान ने देखा तो उसे मारकर स्वयं मणि ले ली और उसे ले जाकर बच्चे को खेलने के लिए दे दी।



इधर द्वारिका में काना-फूसी के शब्द श्रीकृष्णजी के कानों तक पहुँचे। वे राजा उग्रसेन से परामर्श कर कुछ साथियों को लेकर प्रसेन के घोड़ो के खुरों के चिन्हों को देखकर वन में पहुँचे। वहां उन्होनें घोड़े और प्रसेन को मृत पड़ा पाया और उनके पास सिंह के चिन्ह देखें। उन चिन्हों का अनुसरण करते हुए आगे जाने पर उन्हें सिंह को भी मृत पड़ा पाया। वहां ऋक्षराज जाम्बवान के पैरों के निशान देखते हुए वे लोग जाम्बवान की गुफा पहुँचे। श्रीकृष्ण भगवान ने कहा कि यह तो स्पष्ट हो चुका हैं कि प्रसेन सेन घोड़े सहित सिंह द्वारा मारा गया है। परन्तु सिंह से भी बलवान कोई हैं जो इस गुफा में रहता हैं। मैं इस गुफा में से स्यमन्तक मणि लाने की कोशिश करता हूँ। यह कहकर श्याम गुफा में घुस गए। वहां उनका ऋक्षराज जाम्बवान से इक्कीस दिनों तक घोर संग्राम युद्ध हुआ।



अन्त में जाम्बवान ने भगवान को पहचान कर उनसे प्रार्थना करते हुए कहा-हे प्रभु! आप ही मेरे स्वामी श्री राम हैं। नाथ! मैं अर्ध्यस्वरूप अपनी इस कन्या जाम्बवती और यह मणि स्यमन्तक आपको देता हूँ। कृपया ग्रहण कर मुझे कृतार्थ करें तथा मेरे अज्ञान को क्षमा करें। जाम्बवान से पुणित हो श्री कृष्ण स्यमन्तक मणि लेकर जाम्बवती के साथ द्वारका आये। कृष्ण के साथ जो यादवगण गए थे वो तो बारह दिन बाद ही वापिस आ गए थे और श्री कृष्ण ने इक्कीस दिन गुफा में युद्ध किया था। तब यह विश्वास हो गया था कि श्री कृष्ण गुफा में मारे गए। किन्तु श्री कृष्ण को आया देखकर द्वारका में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। श्री कृष्ण ने जब यादवों से भरी सभा में वह मणि सत्राजित् को दे दी तो सत्राजित् ने भी प्रायश्चित स्वरूप अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया। इस मणि का आख्यान जो पढ़ता हैं या सुनता हैं, उसे भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के चन्द्रदर्शन के दोष से मुक्ति मिल जाती हैं।

Saturday, 19 February 2022

February 19, 2022

शरद पूर्णिमा क्यों मनाते हैं, जानें पूजा विधि, कथा, उद्यापन विधि और महत्व(Why celebrate Sharad Purnima, know the puja vidhi, katha, Udyapan vidhi and its importance)

                       


शरद पूर्णिमा क्यों मनाते हैं, जानें पूजा विधि, कथा, उद्यापन विधि और महत्व(Why celebrate Sharad Purnima, know the puja vidhi, katha, Udyapan vidhi and its importance):-शरद पूर्णिमा आश्विन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा शरद् पूर्णिमा कहलाती हैं। चन्द्रमा रात्रिकाल में सोलह कलाओं से युक्त होकर शरद पूर्णिमा तिथि के समय में अपनी शीतल मन को हरणे वाली किरणों से जगत को रोशन करता हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी तिथि को रासलीला की थी। इसलिए बृज में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, इसे "रासोत्सव" या "कौमुदी महोत्सव" भी कहते हैं। 

इस व्रत में प्रदोष और निशीथ दोनों में होने वाली पूर्णिमा भी जाती हैं। यदि पहले दिन निशीथ-व्यापिनी और दूसरे दिन प्रदोष व्यापिनी न हो तो पहले दिन व्रत करना चाहिए। शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा की चांदनी में अमृत निवास रहता हैं। उसकी किरणों से अमृतत्त्व व आरोग्य की प्राप्ति सुलभ होती हैं।



शरद पूर्णिमा व्रत पूजा विधि-विधान:-इस दिन निम्नलिखित विधि व्रत की पूजा विधि करनी चाहिए।

◆प्रातःकाल अपने आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषण से सुशोभित करना चाहिए।

◆फिर उनका यथा विधि षोडशोपचार पूजन करना चाहिए।

◆अर्धरात्रि के समय गौ दूध से बनी खीर का भगवान को भोग लगाना चाहिए।

◆खीर से भरे पात्र को रात्र में छंत पर खुली चांदनी में रखना चाहिए। इसमें रात्रि के समय चन्द्र की किरणों द्वारा अमृत गिरता हैं। 

◆पूर्ण चन्द्रमा के मध्य आकाश में स्थित होने पर उनका पूजन कर अर्ध्य प्रदान करना चाहिए। 

◆इस दिन कांस्य पात्र में घी भरकर सुवर्ण सहित ब्राह्मण को दान देने से मनुष्य ओजस्वी होता हैं।

◆अपराह्न में हाथियों का नीराजन करने का भी विधान हैं।

◆आश्विन मास की पूर्णिमा "शरद पूर्णिमा" शरद पूर्णिमा के दिन शाम को खीर बनाकर चन्द्रमाजी को भोग लगाना चाहिए और खीर, चपडों, शक्कर आदि थाली में रखकर छत पर रात को रखना चाहिए और रात को बारह बजे के बाद उसे प्रसाद के रूप में काम लेना चाहिए।

शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमाजी की रोशनी में सूई भी पिरोनी चाहिए, जिससे आंखों की रोशनी तेज होती हैं।


शरद पूर्णिमा की कहानी:-एक साहूकार के दो बेटियां थी। दोनों कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करती थी। बड़ी बहिन तो व्रत पूरा करती थी और छोटी बहिन अधूरा व्रत करती थी। तब उन्हें बच्चा होते ही मर जाते, यानी बच्चा जीवित नहीं रहते। एक दिन छोटी बहिन ने पण्डितजी को बुलाकर पूछा कि मेरे बच्चे जीवित नहीं रहते हैं, उनका जन्म होते ही मर जाते हैं। जब पण्डितजी ने कहा-तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इस कारण तुम्हारे बच्चे जीवित नहीं रहते हैं।

आप व्रत पूरा करोगे तो आपके बच्चे जीवित रहेगें। छोटी बहिन ने अब पूरे विधि-विधान से व्रत पूरे किए, लेकिन फिर भी थोड़े दिन बाद लड़का होकर मर गया। उस मरे हुए बच्चे को उठाकर पलंग पर सुला दिया और चादर से ढ़क दिया। 

फिर बड़ी बहिन को बुलावा भेजा। बड़ी बहिन पलंग पर सोते हुए बच्चे को छूते ही लड़का रोने लगा।

जब छोटी बहिन ने कहा कि यह आपके पुण्य प्रताप से मेरा लड़का जीवित हुआ हैं। हम दोनों का पूर्णिमा का व्रत करती थी। आप तो पूरा व्रत करती थी, लेकिन मैं अधूरा व्रत करती थी। इडके दोष से मेरे बच्चे जीवित नहीं रहते हैं। आपके छूते ही बच्चा जैसे गहरी नींद से उठ गया और वैसे ही रोने लगा। हे पूर्णिमा माता! जैसे छोटी बहिन की गोद भर, वैसे ही सभी की गोद भरना और जो कोई भी पूर्णिमा का व्रत करे तो वह पूरा व्रत करें।

शरद पूर्णिमा उद्यापन विधि:-पूर्णिमा का उजमणा पूर्णिमा का व्रत झेलने के बाद ही करें। उजमणा में एक बड़े कटोरे में एक चूनड़ी, चूडों, शक्कर, मेवा, सुहाग का सामान भरकर सासुजी को पैर छूकर देवे। अगर श्रद्धा हो तो ब्राह्मणी को भी भोजन करावें।

सामग्री तीस आदमी एक जोड़ा-जोड़ी के कपड़े व सुहाग छाबड़ा, इकतीस लोटा, इकतीस सुपारी, इकतीस जनेऊ जोड़ा, इकतीस छोटे उपवस्त्र व इच्छानुसार दक्षिणा सहित भेंट देना चाहिए।



धार्मिक पंचांगों के अनुसार महत्व:-आश्विन मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा उत्सव के रूप में मनाया जाता हैं। धर्म शास्त्रों में शरद पूर्णिमा को मोह रात्रि एवं शरद पूर्णिमा के व्रत को कोजागर व्रत या कौमुदी व्रत कहते है। माता लक्ष्मीजी शरद पूर्णिमा की रात्रिकाल में घूमने के लिए निकलती हैं, लक्ष्मीजी रात्रिकाल में कौन जाग रहा हैं व कौन नहीं जाग रहा हैं, उनका निरीक्षण करने के लिए निकलती हैं और जो रात्रिकाल में जागते रहने वाले मनुष्य के निवास स्थान में स्थिर रूप से वास करते हुए एवं जागते रहने वाले मनुष्य पर अपनी अनुकृपा करती हैं। इसलिए मनुष्य शरद पूर्णिमा की रात्रिकाल में अधिकांश मनुष्य जागते रहते हैं और माता लक्ष्मीजी की अनुकृपा पाने हेतु इसलिए शरदपूर्णिमा में भगवान विष्णुजी, लक्ष्मीजी और तुलसी माता की पूजा-अर्चना की जाती हैं।


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार महत्व:-शरद पूर्णिमा तिथि के दिन मंगलवार का संयोग अनेक वर्षों में होता हैं, जब यह संयोग होता हैं, तब उस रात्रिकाल में चन्द्रमा पूरे वर्ष में अपनी पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होता हैं और अपनी शीतल व मन को हरणे वाली किरणों से जगत में उजाला करते हैं, इसलिए इस तिथि को महापूर्णिमा कहा जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर रात भर चाँदनी किरणों में उत्तर भारत के मनुष्य के द्वारा रखने की परंपरा हैं, जिससे चन्द्रदेव के द्वारा अपनी अमृततुल्य किरणों से उस खीर में अमृत उत्पन्न हो सके।


शरद पूर्णिमा तिथि के व्रत को करने का महत्व-शरद पूर्णिमा तिथि के व्रत को करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-


1.नेत्रों की दृष्टि बढ़ाने हेतु:-जो मनुष्य शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमाजी की रोशनी में सुई को धागे में पिरोने का बार-बार प्रयास करना चाहिए, जिससे मनुष्य की आंखों में रोशनी तेज होकर बढ़ जाती हैं।


2.श्वास से तकलीफ से मुक्ति पाने हेतु:-शरद पूर्णिमा की रात्रि श्वास रोग से ग्रसित मनुष्य के लिए जीवन दायक होती हैं।


3.गर्भवती औरत के गर्भ की रक्षा हेतु:-शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा की पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त किरणों का प्रभाव जब गर्भवती औरत की कुक्षि पर पड़ने से गर्भ में स्थित गर्भ का पूर्ण विकास होकर मजबूत अंग-प्रत्यंगों से युक्त हो जाता है। इस तरह से वर्ष भर में शरद पूर्णिमा की एक रात्रि के प्रभाव से गर्भ के लिए औषधियों की तरह किरणें असर करती हैं।


4.माता लक्ष्मीजी को खुश करके उनकी अनुकृपा पाने हेतु:-शरद पूर्णिमा तिथि के व्रत को करके माता लक्ष्मीजी को खुश किया जा सकता हैं और उनकी अनुकृपा प्राप्त की जा सकती हैं, जिससे मनुष्य को रुपयों-पैसों का सुख मिल जाता हैं और जीवन में खुशहाली भर जाती हैं।


5.मानसिक विकारों से राहत:-मनुष्य पर माता लक्ष्मीजी की अनुकृपा होने से मनुष्य को समस्त तरह से सुख-ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है और मन में उत्पन्न नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं।


6.दाम्पत्य जीवन में सुख-शांति:-मनुष्य को दाम्पत्य जीवन में उत्पन्न होने लड़ाई-झगड़े एवं आपसी मतभेद आदि से राहत मिल जाती हैं।


7.समस्त तरह की व्याधियों से राहत:-मनुष्य को शारिरिक व्याधियों से राहत मिलता  हैं।







Sunday, 19 December 2021

December 19, 2021

धनतेरस क्यों मनाते हैं, जानें पूजा विधि, कथा और महत्त्व(Why celebrate Dhanteras, know puja vidhi, katha and importance)




धनतेरस क्यों मनाते हैं, जानें पूजा विधि, कथा और महत्त्व(Why celebrate Dhanteras, know puja vidhi, katha and importance):-पंच दिवसात्मक दीपावली पर्व का पहला दिन अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को 'धनत्रयोदशी' अथवा 'धनतेरस' के रूप में मनाया जाता है। धनतेरस दीपावली के दो दिन पूर्व का पर्व होने से तथा धन के देवता कुबेर एवं लक्ष्मी जी, स्वास्थ्य के देवता धन्वन्तरी जी और मृत्यु के स्वामी यमराज जी के पूजन का पर्व होता है। हिन्दुधर्म में कार्तिक मास के इस पर्व में धन की प्राप्ति करने में, शरीर की बीमारियों को दूर करने का और बिना समय मृत्यु पर विजय प्राप्त की जा सकती है, इसलिए इस पर्व का महत्त्व ज्यादा होता हैं।

धनतेरस कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी ही धनतेरस कहलाती हैं। इसे धनवंतरी त्रयोदशी भी कहते हैं। 

धनतेरस का अर्थ:-जिस तिथि को पूजन करने से धन अर्थात् रुपये-पैसों की प्राप्ति होती हैं, उसे धनतेरस कहा जाता है।

नवीन कार्य को प्रारम्भ भी धनतेरस के दिन करते है, क्योंकि यह एक अबूझ मुहूर्त होता हैं, इसमें किसी भी तरह के समय शुद्धि की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस दिन मनुष्य स्वर्ण, रजत धातु की वस्तुओं एवं स्टील की बनी वस्तुओं को विशेष रुप से खरीदते हैं। इस दिन रजत धातु की बनी हाथी की प्रतिमा, उल्लू  एवं कमल के पुष्प को खरीद कर उसका विधिविधान से पूजन करके दीपावली की रात्रिकाल में पूजन विधि में रखने से उन वस्तुओं को अपने तिजोरी या अपने पूजा स्थल में रखने से धन-सम्पत्ति से सम्बंधित सभी तरह के आर्थिक विकारों से छुटकारा मिल जाता हैं। नवीन कार्य को प्रारम्भ भी धनतेरस के दिन करते है, क्योंकि यह एक अबूझ मुहूर्त होता हैं, इसमें किसी भी तरह के समय शुद्धि की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस दिन मनुष्य स्वर्ण, रजत धातु की वस्तुओं एवं स्टील की बनी वस्तुओं को विशेष रुप से खरीदते हैं। इस दिन रजत धातु की बनी हाथी की प्रतिमा, उल्लू  एवं कमल के पुष्प को खरीद कर उसका विधिविधान से पूजन करके दीपावली की रात्रिकाल में पूजन विधि में रखने से उन वस्तुओं को अपने तिजोरी या अपने पूजा स्थल में रखने से धन-सम्पत्ति से सम्बंधित सभी तरह के आर्थिक विकारों से छुटकारा मिल जाता हैं।


धन्वन्तरी एवं लक्ष्मी जी उदय की कथा:-धनतेरस के दिन धनवंतरीजी के पूजन का बहुत महत्त्व बताया जाता है। अमृत कलश को पाने के लिए जब देवता व दैत्यों ने समुद्र मंथन किया था। तब चौदह रत्नों के साथ धनवंतरी वेद हाथ मे अमृत कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए थे। यह पर्व वैद्यों के लिए महत्त्व का हैं, क्योंकि धनवंतरी देव आयुर्वेद के जनक माने जाते है। इसलिए इस त्योहार का नाम धनवंतरी त्रयोदशी धनतेरस पड़ा। यह दिन अकाल मृत्यु से बचाव करने वाला होता हैं।


धनतेरस की पूजा विधि:-धनत्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी एवं धनाध्यक्ष कुबेर की पूजा होती हैं, वहीं यमराज के नाम पर दीपदान भी किया जाता है।

◆व्यापारी मनुष्य अपने हिसाब-किताब को देखकर समाप्त करते है और बही-खाता तथा रोकड़ को इकट्ठा करके पूजन करते हैं। दीपमाला भी इसी दिन जलाने का प्रावधान होता हैं और पांच दिन तक हमेशा जलाई जाती हैं।


◆इस दिन पुराने बर्तनों को बदलना चाहिए एवं नये बर्तनों को खरीदना अच्छा माना जाता है। इस दिन धातु के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।


◆इस दिन चांदी की वस्तुओं की खरीदारी करना बहुत ही पुण्यदायक माना जाता हैं।


◆स्टील के नए बर्तन खरीदना अत्यंत ही शुभ माना जाता है। यह यमराज से सम्बन्ध रखने वाला त्यौहार हैं।


◆सबसे पहले धनतेरस के दिन सवेरे जल्दी उठकर अपनी दैनिकचर्या स्नानादि से निवृत होना चाहिए।


◆फिर स्वच्छ वस्त्रों को धारण करना चाहिए।


◆फिर अपने घर के पूजा स्थल की जगह को साफ-सफाई करनी चाहिए।


◆उस पूजा स्थल की जगह पर भगवान धनाध्यक्ष कुबेर, भगवान धन्वंतरि जी, गणपति जी, लक्ष्मी की प्रतिमा को एवं मिट्टी या धातु की बनी प्रतिमा को विराजमान करना चाहिए।


◆पूजा को शुरू करने के लिए तांबे या रजत धातु की आचमनी लेकर जल से आचमन करना चाहिए।


◆फिर भगवान गणपति जी को पूजा में आने के लिए उनको मन ही मन में याद करते हुए उनको पधारने का निमंत्रण देना चाहिए।


षोडशोपचारैंः पूजा कर्म:-इस तरह भगवान धनाध्यक्ष कुबेर, भगवान धन्वंतरि जी, गणपति जी एवं लक्ष्मी जी का षोडशोपचारैंः पूजा कर्म  से पूजन करना चाहिए, जो इस तरह हैं:

पादयो र्पाद्य समर्पयामि, हस्तयोः अर्ध्य समर्पयामि,

आचमनीयं समर्पयामि, पञ्चामृतं स्नानं समर्पयामि

शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि, वस्त्रं समर्पयामि,

यज्ञोपवीतं समर्पयामि, गन्धं समर्पयामि,

अक्षातन् समर्पयामि, अबीरं गुलालं च समर्पयामि,

पुष्पाणि समर्पयामि, दूर्वाड़्कुरान् समर्पयामि,

धूपं आघ्रापयामि, दीपं दर्शयामि, नैवेद्यं निवेदयामि, 

ऋतुफलं समर्पयामि, आचमनं समर्पयामि,

ताम्बूलं पूगीफलं दक्षिणांं च समर्पयामि।।


आह्वान:आवाहनार्थे पुष्पाजंलि समर्पयामि। आह्वान के लिए पुष्प को छोड़ना चाहिए।

आसन:आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। पुष्प को छोड़ना चाहिए।

पाद:पाद्यर्यो:पाद्यं समर्पयामि। जल को चढ़ावें।

अर्ध्य:हस्तयो:अर्ध्य स्नानः। चन्दन पुष्प से युक्त अर्ध्य देवें।

आचमन:आचमनं समर्पयामि। जल छोड़े।


धन्वन्तरी देव का ध्यान मन्त्र:-उसके बाद में हाथ में पुष्प और चावल लेकर मन ही मन में भगवान धन्वन्तरी जो को याद करना चाहिए।

देवान कृशान सुरसंघनि पीडितांगान दृष्ट्वा दयालुर मृतं विपरीतु कामः पायोधि मंथन विधौ प्रकटौ भवधो धन्वन्तरिः स भगवानवतात सदा नःऊँ धन्वन्तरि देवाय नमः। 

ध्यानार्थे अक्षत पुष्पाणि समर्पयामि।


पुष्प को अर्पण करते हुए जल से आचमन करना चाहिए।


फिर जल से तीन बार छींटे देते हुए मन्त्र का उच्चारण करते हुए पाद्यं अर्ध्यं आचमनीयं समर्पयामि कहना चाहिए।


स्नानः स्नानार्थ जलं समर्पयामि। जल से स्नान करावें।

स्नानांग-आचमन:स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि जल चढ़ावे।

उसके बाद में मन्त्र बोलते हुए 

ऊँ धन्वन्तरायै नमः स्नानार्थे जलं समर्पयामि। 


स्नान के लिए जल को अर्पण करना चाहिए


फिर पंचामृत स्नान:-फिर पंचामृत से स्नान कराते समय यह मंत्र का उच्चारण करना चाहिए

ऊँ धन्वन्तरायै नमः पंचामृत स्नानार्थे पंचामृत समर्पयामि।

गंधोदक स्नानं:-गंधोदक स्नानं समर्पयामि। चन्दन एवं इत्र से सुवासिते जल का स्नान करना चाहिए ।

शुद्धोदक स्नानं:-फिर से जल के छींटे लगाकर शुद्ध जल से स्नान कराते समय यह मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

ऊँ धन्वन्तरायै नमः पंचामृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।

आचमनः आचमनीयं जल समर्पयामि। फिर जल से स्नान करना चाहिए।

यज्ञोपवीतं: यज्ञोपवीतं समर्पयामि। जनेऊ को अर्पण करें।

वस्त्र अर्पण करना:-उसके बाद में वस्त्रों के रूप में मौली को छोटे टुकड़ों को अर्पण करते समय यह मंत्र का उच्चारण करना चाहिए

ऊँ धन्वन्तरायै नमः वस्त्रं समर्पयामि। 

उपवस्त्रं को अर्पण:-करें। ऊँ धन्वन्तरायै नमः उपवस्त्रं समर्पयामि। उसके बाद में उपवस्त्रों के रूप में मौली को छोटे टुकड़ों को अर्पण करते समय यह मंत्र का उच्चारण करना चाहिए

अब भगवान पर खुशबु से युक्त इत्र को छिड़कते समय  सुवासितं इत्र समर्पयामि मन्त्र का उच्चारण करते हुए ही करना चाहिए।

गन्धं समर्पयामि, इत्र को छिड़कते हुए बोलना चाहिए।


अक्षातन् समर्पयामि। अक्षत को अर्पण करें।


पुष्पमाला:पुष्पमालां समर्पयामि। पुष्पमाला को चढ़ावें।


नानापरिमल द्रव्ययःनानापरिमल द्रव्यामि समर्पयामि। 

अबीर, गुलाल आदि को चढ़ाना चाहिए।

अबीरं गुलालं च समर्पयामि,


लाल चंदन से रोली या कुमकुम से भगवान का तिलक करना चाहिए।


पुष्पाणि समर्पयामि। पुष्प को अर्पण करें।

दूर्वाड़्कुरान् समर्पयामि। दूर्वा आदि को अर्पण करें।


धूपं को दुखाना:धूपं आघ्रापयामि। अगरबती के धुएं को चारों ओर घुमाते हुए।


दीपं को दिखाना:दीपं दर्शयामि। प्रज्वलित दीपक की लौ दिखाना चाहिए।


नैवेद्य को प्रसाद के रूप में भोग अर्पण करना:अब भगवान को भोग के जो मिठाई ली हैं, उस प्रसाद को भोग के रूप में भगवान को अर्पण करना चाहिए और प्रसाद के भोग के चारों ओर जल को लेकर घुमाना चाहिए।

नैवेद्यं निवेदयामि, नैवेद्य को निवेदित करना चाहिए।


आचमनीयं जलं:पूजा करने वाले मनुष्य को अपने बैठने की जगह पर जहां पर बैठकर पूजा की शुरुआत की हैं, उस स्थान पर जल को छिटकते समय आचमनीयं जलं समर्पयामि मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए।


ऋतुफलं अर्पण करने:ऋतुफलं समर्पयामि। फिर भगवान ऋतु में जो भी फल उपलब्ध होता है, वह फल अर्पण करते समय ऋतुफलं समर्पयामि मंत्र को बोलते हुए फल को अर्पण करके चारों और जल को घुमाते हुए जल को छिड़कें।


आचमनं को अर्पण करना:आचमनं समर्पयामि।

नैवेधान्तेध्यानमाचमनीयं जलमुत्तरापोSशनं हस्तप्रक्षालनपार्थ मुखप्रक्षालनार्थ च जलं समर्पयामि। जल को छोड़ना चाहिए।


ताम्बूलं पूगीफलं को अर्पण करना:ताम्बूलं पुंगीफल पान का बीड़ा जिसमें लौंग, इलायची, सुपारी सूक्त पंचमेवा से युक्त होता हैं, उसको भगवान को अर्पण करते समय ताम्बूलं पूगीफलं समर्पयामि मंत्र का उच्चारण करते हुए उनको मुखवास के लिए अर्पण करना चाहिए।


दक्षिणा अर्पण करना:दक्षिणांं च समर्पयामि।।फिर भगवान को दक्षिणा को अर्पण करते समय दक्षिणा समर्पयामि मंत्र को बोलते हुए अर्पण करना चाहिए।


वस्तु की पूजा:जो धनतेरस के दिन बर्तन या धातु की वस्तु जिसमें स्वर्ण या रजत धातु की वस्तु को खरीदा हैं, उस वस्तु का पूजन करके उस वस्तु को भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए और दक्षिणा के रूप में रुपये-पैसों को भी अर्पण करना चाहिए।


आरती करना:जब कपूर को अग्नि की ज्वाला से प्रज्वलित करते समय कर्पूर निराजंन दर्शयामि बोलते हुए दर्शन करना चाहिए।


धन्वन्तरी देवता से प्रार्थना:-भगवान धन्वन्तरी देवता से इस तरह बोले-हे स्वास्थ्य रक्षक देव! आप से अरदास करता हूँ कि आप समस्त तरह की व्याधियों के निवारण के स्वामी हैं। आप समस्त प्राणी की व्याधियों का हरण करके उनको आरोग्यता प्रदान करें।


यमराज जी का पूजन एवं दीपदान की विधि:-यमराज जी का पूजन एवं दीपदान की विधि इस तरह से करे:

फिर सायंकाल के समय आटे से बनाकर दो दियो को बनाये और उनमें सरसो का तेल भरकर चारमुखी बात्ति को रखकर, फिर अपने निवास स्थान के मुख्य दरवाजे के बाहर की तरफ गेंहू की ढेरी करके उन दियों की बात्ति का मुख दक्षिण दिशा की तरफ रखकर प्रज्वलित करना चाहिए। यमराज जी का पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए। 


यमराज से प्रार्थना:-हे मृत्यु के रक्षक स्वामी! आप समस्त जगत के प्राणियों के जीव का हरण करने वाले हो। आपसे अरदास करता हूँ, हे स्वामी! आप मनुष्य के प्राणों का हरण अकाल नहीं करे और अकाल मृत्यु के डर से मुक्त करें।


फिर धनाध्यक्ष कुबेर को स्मरण करते हुए उनके मन्त्र का उच्चारण:-

ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधि पतये धनधान्य समृद्धि में देहि दापय दापय स्वाहा।


◆ततपश्चात में लक्ष्मीजी, कुबेर भगवान, गणपति जी, हस्ती और भगवान धन्वन्तरी जी की पूजा करनी चाहिए।


◆उसके बाद में आरती को करने से निश्चित रूप से उचित फल मिलता हैं।


◆फिर प्रसाद को समस्त परिवार के सदस्यों को देकर स्वयं भी प्रसाद को ग्रहण करना चाहिए।


◆इस तरह से पूजा करने से निश्चित रुप से ईश्वर की अनुकृपा प्राप्त होती हैं।


◆धनतेरस के रूप में इस दिन धनाध्यक्ष कुबेर की पूजा होती हैं।इस दिन व्यक्ति सतैल स्नान करना चाहिए।


◆हल जूती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर तीन बार अपने शरीर पर फेरना चाहिए।


◆फिर कुमकुम लगाना चाहिए।


◆कार्तिक स्नान करके प्रदोष के सायंकाल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुंआ, मन्दिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाना चाहिए।


◆तुला राशि के सूर्य में चतुर्दशी एवं अमावस्या की संध्या को जलती लकड़ी की मशाल से पितरों का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए।


धनतेरस की कथा:-एक बार यमराज ने अपने दूतों से कहा कि तुम लोग मेरी आज्ञा से मृत्युलोक के प्राणियों के प्राण हरण करते हों। क्या तुम्हें ऐसा करते समय दुःख हुआ या कभी दया भी आई है? इस पर यमदूतों संकोच में पड़कर कहा-'नहीं महाराज! हम तो आपके आदेश का पालन करते हैं और हमें दया भाव से क्या प्रयोजन?' तब यमराज ने विचार किया कि शायद ये संकोचवश इस तरह की बात कह रहे हैं। तब यमराज ने कहा कि-आप सब बिना डर के मुझे बताओं  एवं किसी भी तरह की असमंजस में पड़ने की जरूरत नहीं हैं। यदि कभी किसी के भी प्राण को हरते समय तुमको दया आई हो या किसी के प्राण को लेते समय मन में दुःख हुआ हो तो बताओ। तब यमदूतों ने डरते हुए कहा-हे महाराज! हम लोगों का कर्म अत्यन्त क्रूर हैं, परन्तु किसी युवा प्राणी की अकाल मृत्यु पर उसका प्राण हरण करते समय वहां का करुण रुदन सुनकर हम लोगों का पासण हृदय भी विचलित हो जाता हैं। तब यमदूतों ने बताया कि एक बार हम लोगों को एक राजकुमार के प्राण उसके विवाह के चौथे दिन ही हरण करने पड़े। 

उस समय वहां का करुण रुदन चित्कार व हाहाकार देख सुनकर हमें अपने कर्त्तव्य से घृणा हो गयी। उस मंगलमय उत्सव के बीच हम लोगों का ये कृत्य अत्यन्त घृणित था। जिससे हम लोगों का हृदय अत्यंत दुःखी हो गया। तब यमराज ने पूछा कि-हे यमदूतों! मुझे इस विषय में पूर्ण बात बताओं। तब यमदूत कहते-हे स्वामिन्! 

बहुत समय की बात हैं, एक हंस नाम का राजा राज्य किया करता था। वह एक दिन जंगल में शिकार करने के लिए गया। तब वह शिकार की खोज के चक्कर में अपने साथ सैनिकों एवं अपने साथियों से बिछुड़ गया और दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाता हैं। यमराज ने पूछा-फिर क्या हुआ? तब यमदूतों ने बताया कि उस राज्य का राजा हेमा था। जब राजा हेमा की मुलाकात हंस राजा से होती है, तब हंस राजा की बहुत ही आवगवत-सत्कार करता हैं। उसी दिन ही हेमा राजा की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म देती हैं। ज्योतिषियों के द्वारा नक्षत्रों की गणना करके बताते है, की यह बालक विवाह के चार दिन के बाद मर जायेगा।

राजा हंस काफी सोच-विचार करके अपने उस बालक को अपने अधिकारियों की सलाह के द्वारा उसे यमुना के किनारे पर स्थित एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में रहने के लिए भेज दिया। किन्तु समय का खेल निराला होता है। जैसे-जैसे समय बीतता गया वह बालक बड़ा हुआ। एक दिन सयोंग से राजा हंस की जवान पुत्री यमुना के किनारे पर आती हैं और दोनों की मुलाकात हो जाती है। एक-दूसरे को देखकर मोहित हो जाते है और वह ब्रह्मचारी उस जवान कन्या से गंर्धव विवाह कर लेता हैं। इस तरह तीन दिन तक ठीक चलता है और चौथा दिन आ जाता हैं, उस चौथे दिन ही उस राजकुमार की मृत्यु हो जाती हैं।


इस तरह नव परिणीता का करुण विलाप को सुनकर हमारा हृदय कांप गया था। ऐसी सुन्दर जोड़ी हमने कभी नहीं देखी थी। वे कामदेव तथा रति की तरह सुंदर थे। उस युवक को कलग्रस्त करते समय हमारे भी अश्रु नहीं रुक पा रहे थे। तब यमराज ने द्रवित होकर पूछा-हे यमदूतों! फिर क्या किया जाए। विधि के विधान को मैं नहीं रोक सकता हूँ। मुझे तो मेरे कार्यों को करना पड़ता हैं। 


तब यमदूतों ने पूछा- हे स्वामिन्! कृपा करके कोई ऐसी युक्ति बताइये, जिससे ऐसी अकाल मृत्यु न हो। तब यमराज ने बताया कि धनतेरस के दिन पूजन करने से और दीपदान को विधि के अनुसार करने से अकाल मृत्यु से बचा जा सकता हैं।इस पर यमराज ने कहा कि जो धनतेरस के पर्व पर सायंकाल घर के बाहर मुख्य दरवाजे पर एक पात्र में अन्न रखकर उसके ऊपर यमराज के निमित्त दक्षिणाभिमुख होकर दीपदान करना चाहिए तथा उसका गन्ध आदि से पूजन करना चाहिए। 


जिस जगह पर धनतेरस को पूजन एवं दीपदान किया जाएगा। वहां पर किसी भी मनुष्य की अकाल मृत्यु नहीं होगा। इस तरह से धनतेरस के दिन धन्वन्तरी पूजन के साथ कुबेर पूजन एवं यम दीपदान की शुरुआत हुई थी, जो कि समय के साथ आज के युग में भी चल रही हैं। इस तरह धनतेरस के दिन दीपदान करने से यमराज की अनुकृपा प्राप्त हो जाती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त हो जाता हैं, जिससे अकाल मृत्यु के डर का भय खत्म हो जाता हैं।


एक दन्तकथा के अनुसार धनतेरस के स्वर्ण, रजत एवं धातु के वस्तुओं की खरीदने के पीछे की दन्तकथा:-प्राचीन समय में एक राजा अपने राज्य में राज करता था। उसके राज में समस्त प्रजा खुश एवं समृद्धिपूर्वक जी रही थी। उस राजा के एक सन्तान के रूप में पुत्र हुआ, तब ज्योतिषीयों ने नक्षत्र की गति के आधार पर राजा को कहा कि-हे राजन! इस बालक का जीवन काल में यदि लग्न होता हैं, तब यह लग्न के चार दिवस के बाद कालकवलित हो जाएगा। 


इस तरह के वचन को सुनकर राजा ने विचार विमर्श करके अपने सन्तान को किसी ऐसी जगह पर भेज दिया, जहां पर किसी स्त्री की छाया भी नहीं पड़ सके, भाग्यवश बालक युवावस्था में प्रवेश करता हैं, तब उस युवराजकुमार की मुलाकात एक राजकुमारी से होती है और दोनों ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाते है और गन्धर्व विवाह कर लेते है। जब वह राजकुमारी अपने राज्य में अपने पति को ले जाती है, तब उसके पिता उसका सत्कार करते है और अपनी पुत्री के भाग्य को जानने हेतु ज्योतिषी से पूछते है, तब ज्योतिषी बताते है, की आपके पुत्री के लग्न के चार दिन बाद उसके पति की मृत्यु हो जाएगी। इस तरह जब राजकुमारी को इस तरह की बात मालूम पड़ती है, तब वह अपने पति का बहुत खयाल रखते हुए दिन को गिनने लगती है और चौथे दिन उसने अपने पति से अरदास करते हुए कहती है, की स्वामी आप आज की रात आपको जागना होगा, इसलिए वह रातभर अपने पति को सोने से रोकने के लिए उसको कई तरह की बातें करते हुए नयी-नयी कहानियों को सुनाती हैं और संगीत भी गाती हैं। 


अपने शयनकक्ष के चारो तरफ सोने, चांदी की वस्तुओं एवं आभूषणों, तरह-तरह के धातुओं के बर्तन और हीरे-जेवरातों को रखवा देती हैं और चारों तरफ तेल से भरे हुए बहुत सारे दीपकों को प्रज्वलित करवा देती हैं। उस रात्रिकाल में यमराजजी अपने यमदूतों के साथ सर्प के रुप में उसके प्राण को हरने आते है, लेकिन उस शयनकक्ष में उन सभी तरह के धातुओं की चमक एवं दीपक की रोशनी से प्रवेश नही कर पाते है और उनके आंखों की रोशनी कम होकर अंधे हो जाते है। वे रात भर उसके प्राणों का हरण करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उस राजकुमार के प्राण को हर नहीं पाते है और उस राजकुमारी के संगीत एवं कहानियों को सुनने में मग्न हो जाते है। इस तरह समय बीतने पर सुबह हो जाती है, तब यमराजजी को वहां से प्रस्थान करना पड़ता हैं। क्योंकि मृत्यु का समय व्यतीत हो जाता है। राजकुमारी अपने पति के प्राणों को इस तरह बचा लेती है।


यमराज की पूजा-विधि एवं दीपदान विधि:-धनतेरस के दिन यमराज की पूजा एवं दीपदान की विधि इस तरह हैं:

◆कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को वैदिक देवता यमराज का पूजन किया जाता हैं। इस दिन यमराज के निमित्त यम के लिए आटे का चौमुखा दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता हैं।

◆रात को घर की औरतें दीपक में तेल डालकर चार बत्तियां जलाती है। 

◆जल, रोली, चावल, गुड़, फूल, नैवेद्य आदि अर्पित कर दीपक जलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर निम्न मंत्र का जप कर यम का पूजन करती हैं।


◆दीपदान करते समय प्रार्थना:-दीपदान करते समय निम्नलिखित प्रार्थना करनी चाहिए, जो इस तरह है:

मंत्र:-

मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।

योदश्यां दीपदानात्सुर्यजः प्रियतामिति।।


मंत्र:-मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।

त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजःप्रियतां मम।।

अर्थात्:-त्रयोदशी के दिन दीपदान से पाश एवं दण्ड लिए मृत्यु के देवता तथा देवी श्यामा सहित यमराज मुझ पर खुश हों।

धनतेरस के पर्व पर यमराज के निमित्त दीपदान करेगा, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होगी।


धनतेरस की पूजा करने का महत्त्व:-धनतेरस के दिन यमराज, धनाध्यक्ष कुबेर जी एवं धन्वन्तरी जी की पूजा करने का बहुत ही महत्व हैं, जो इस तरह है:

◆धनतेरस के दिन धनाध्यक्ष कुबेर की पूजा करने से मनुष्य को धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है, उस मनुष्य के घर पर कुबेरजी के द्वारा धन का भण्डार भरा रहता हैं।

◆धनतेरस के पर्व को मनाने से मनुष्य के घर में सुख-समृद्धि बनी रहती हैं।

◆धनतेरस के दिन मनुष्य किसी भी व्यक्ति को धन उधार नहीं देना चाहिए और धन का अपव्यय भी नहीं करना चाहिए।

◆धनतेरस के दिन ही यमराज जी की पूजा एवं दीपदान करने से अकाल मृत्यु से छुटकारा मिलता है।

◆इस दिन ही धन्वन्तरी जी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, जो कि औषधियों के स्वामी होते है और समस्त तरह की व्याधियों को निवारण करने वाले होते है। इसलिए उनके प्रकट होने के कारण भी यह पर्व मनाया जाता है। 
















Wednesday, 3 November 2021

November 03, 2021

भाई दूज क्यों मनाते हैं, व्रत पूजा विधि, कथा और महत्व (Why Bhai Dooj is celebrated, vrat puja vidhi, katha and importance)





भाई दूज क्यों मनाते हैं, व्रत पूजा विधि, कथा और महत्व (Why Bhai Dooj is celebrated, vrat puja vidhi, katha and importance):-दीपावली के तीसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज के नाम से जाना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया "यमद्वितीया" भैया दूज कहलाती है। इस दिन बहिन के घर भाई को जाना चाहिए।



भाई दूज व्रत की पूजा विधि:-बहिन को चाहिए कि घर आए भाई को एक शुभ आसन पर बैठाकर हाथ-पैर धुलाये। 

◆इस दिन भाई अपनी बहिन के हाथों रोली-अक्षत लगवाकर मिठाई खाता है और अपनी बहिन को दक्षिणा के रूप में रुपयों-पैसों व वस्त्रों को देता है।

◆विभिन्न प्रकार के उत्तम तरह के व्यंजन परोस कर उसका अभिनंदन करें।

◆भाई बहिन को श्रद्धानुसार उपहार देते हैं।

◆भाई दूज के दिन भाई को अपनी बहिन के घर पर भोजन करना भी शास्त्र के अनुसार जरूरी बताया गया है।

◆परंतु कहीं-कहीं जिनके भाई-बहिन के घर नहीं पहुंच पाते उनकी बहिनें भाई के घर पर जाकर उन्हें टिका लगाकर मिठाइयाँ खिलाती हैं।


भाई दूज के विषय में पौराणिक कथा:-भगवान सूर्यदेव और छाया को यम, यमुना और शनिदेवजी के रूप में सन्तान हुई थी। यम और यमुना दोनों भाई बहिन में बहुत ही प्रेम था। परन्तु यमराज यमलोक की शासन व्यवस्था में इतने व्यस्त रहते थे कि यमुनाजी के घर ही न जा पाते थे। पुराणों में बताया जाता है कि एक बार यम यमुनाजी से मिलने घर आए। भाई यम को अपने घर आया देखकर बहिन यमुनाजी बहुत ही खुश हुई और भाई का बहुत ही आदर व सम्मान किया। 

एक बार यमुना (नदी) अपने भाई यमराज को मांगलिक द्रव्यों से टिका लगाकर उन्हें भोजन कराया था। जिस दिन यमुना ने अपने भाई से निवेदन कर भोजन आदि से संतुष्ट किया था।

बहिन की सेवा से संतुष्ट होकर यमुना से वरदान माँगने के लिए कहा- तब बहिन यमुना ने उत्तर दिया कि आज की पवित्र तिथि के दिन जो भाई-बहिन एक साथ मेरे जल में स्नान करें, उन्हें अन्तकाल में यमलोक में न जाना पड़े व यम-यातना न भोगना पड़े, वह जीवनकाल में सभी तरह के सुख-समृद्धि को प्राप्त होवें और बल्कि सीधे स्वर्गलोक (बैकुण्ठ) में ही जाए। आज के दिन आप हर वर्ष मेरे घर आकर आतिथ्य स्वीकार करें। यमराज ने कहा- बहिन! ऐसा ही होगा। बहिन को वरदान देकर यमराज अपने यमपुरीलोक में चले गए। 

उस दिन कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि थी। इसलिए इस दिन यमुना स्नान का विशेष महत्त्व है।तभी से भाई दूज को माना जाने लगा। 

यदि अपनी सगी बहिन न हो तो काका-बाबा, मामा, मौसी, भुआ की बेटी यह भी बहिन के समान है। इनके हाथ का भोजन करें। उस भाई को धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुख की प्राप्ति होती है।अतः हम सभी लोगों का कर्त्तव्य है कि, इस पावन पवित्र पर्व को विधिवत मनाना चाहिए।


भैया दूज(यम द्वितीया) की दूसरी व्रत कथा:-एक बहिन के सात भाई वठे। वह उन्हें बहुत प्यारी थी। उसका पति अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा था। जिसके होने पर की गई मनौतियों को पूरा न करने से देवता अप्रसन्न थे। इसी कारण देवताओं ने क्रुद्ध होकर पुत्र तथा पुत्रवधु को मार का निर्णय किया। उसकी बहिन को किसी तरह इसका पता चल गया। उसने भावी जीवन में आने वाले दुःखों की कल्पना करके उनके उपचार के तरीके सोचे और अपने भाइयों से कहा कि उसे उसकी ससुराल भेज दिया जाए। 

भाई उसे लेने के लिए आए बिना बहनोई के भेजना नहीं चाहते थे। लेकिन बहिन जिद्द पर अड़ींग रही कि कुछ भी हो वह तो आज ही अपनी ससुराल जाएगी। जब वह नहीं मानी तो भाइयों को मजबूरी में उसे ससुराल भेजने की तैयारियां करनी पड़ी। डोली में बैठने से पहले बहिन ने अपने पास दूध, मांस तथा ओढ़नी रख ली। थोड़ी दूर जानेपर देवताओं के प्रकोप से एक सांप ने उसकी डोली का रास्ता रोक लिया। उसने तुरन्त सांप के सामने दूध रख दिया और आगे बढ़ गई। थोड़ा और आगे जाने पर उस पर शेर झपटा तो उसने मांस फेंक दिया। 

शेर का ध्यान मांस की ओर चला गया और कहार डोली लेकर आगे बढ़ गए।अब रास्ते में यमुनाजी थी। ज्यों ही कहार डोली को यमुना से पार करने लगे। यमुना ऊंची लहरें उठाकर डोली की आत्मसात करने लगी। तब बहिन ने ओढ़नी समर्पित करके यमुना की लहरों को शांत किया। नव वधू को बिना बुलाए घर आया देखकर ससुराल वाले आश्चर्य में पड़ गए। 

बहिन ने आदेश दिया कि उसके गृह प्रवेश के लिए घर के पिछवाड़े फूलों का दरवाजा बनवाया जाए। दरवाजा बना लेकिन ज्यों ही वह उसे पार करने लगी। द्वार उस पर गिर पड़ा। फूलों का दरवाजा होने के कारण उसे बिल्कुल भी चोट नहीं आई। घर में प्रवेश करके उसने सबसे पहले स्वयं खाना खाने लगी तो उसे खाने में सुच्चा कांटा मिला। जिसे उसने एक डिबिया में रख लिया।

शाम को घूमने का समय आया तो सबसे पहले उसने ही जूता पहना। जूते में काला बिच्छू था। उसने वह भी उसी डिबिया में सहेजकर रख लिया। रात हुई तो उसने फिर जिद्द की शैय्या पर पहले मैं ही सोऊंगी। बहू का हर काम के लिए पहल करना यद्यपि किसी को अच्छा नहीं लग रहा था।लेकिन परिस्थिति वश सब हो रहा था। 

सोने के कमरे में उसे काला नाग मिला। उसने उसे भी मारकर सहेज लिया। फिर पति को शैय्या पर सुलाया। इतना सब करने के पश्चात उसने अपनी सास को डिबिया खोलकर सुच्चा कांटा, बिच्छू तथा सांप दिखते हुए कहा- मैनें तुम्हें पुत्रवती किया हैं। स्वयं कष्ट सहनकर तुम्हारे पुत्र की रक्षा करके अपने सुहाग को नया जीवन दिया हैं। ये सब कष्ट देवताओं के रुष्ट हो जाने के कारण उठाने पड़े। 

भविष्य में कभी भी मनौती मानकर उन्हें पूरा करना न भूलना। इतना कहकर सात भाइयों की परम प्यारी बहिन पीहर लौट गई। तब सास ने देवी-देवताओं का पूजन करके भाई-बहिनों के प्रेम की प्रशंसा तथा उनके सुखी होने की आशीष दी।

भाई दूज व्रत का महत्त्व:-भाई दूज का त्यौहार बहिन के द्वारा अपने भाई की उम्र की बढ़ोतरी के लिए करती है, जिससे भाई के ऊपर किसी भी तरह संकष्टो से मुक्ति मिल जावे।

◆बहिन के द्वारा भाई के भगवान यमराज से अरदास करती है हे यमराजजी आप मेरे भाई की काल से रक्षा करना।

◆भाई के द्वारा बहिन के घर पर अपना व्रत छोड़ने पर बहिन को सुख-सौभाग्य की प्राप्ति का वरदान मिलता है।


November 03, 2021

छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है, नरक चतुर्दशी की पूजा विधि, कथा एवं महत्व (Why is Choti Diwali celebrated, puja vidhi, katha & importance of Narak Chaturdashi)



छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है, नरक चतुर्दशी की पूजा विधि, कथा एवं महत्व (Why is Choti Diwali celebrated, puja vidhi, katha & importance of Narak Chaturdashi):-कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी या "नरक चतुर्दशी" या रूप चतुर्दशी या छोटी दीपावली कहा जाता है। दीपावली हिंदुओं का पवित्र पर्व माना जाता है। दीपावली के एक दिन पूर्व पर्व का भी हिंदुओं के जीवन में बहुत ही महत्व माना गया है। दीपावली से एक दिन पूर्व छोटी दीपावली मनाई जाती है। 

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी पूजा विधि:-इस दिन अरुणोदय से पूर्व प्रत्युषकाल में स्नान करने से मनुष्य को यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता है। 

◆जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय के बाद स्नान करता हैं, उसके द्वारा किये गये सभी शुभ कार्यों का नाश हो जाता है। 

◆इस दिन देवताओं का पूजन करके दीपदान करना चाहिए।

◆मन्दिरों, गुप्त गृहों, रसोई घर, स्नानघर, देव वृक्षों के नीचे, सभा भवन, नदियों के किनारे, चाहरदीवारी, बगीचे, गली-मौहल्ले, गौशाला आदि प्रत्येक स्थान पर दीपक जलाना चाहिए।

◆यमराज के उद्देश्य से त्रयोदशी से अमावस्या तक दिप जलाने चाहिए।

रूप चतुर्दशी:-इस दिन सौन्दर्य रूप श्रीकृष्णजी की पूजा करनी चाहिए। इस दिन व्रत भी रखना चाहिए। इसी दिन नरक चतुर्दशी का भी व्रत करना चाहिए। सुबह अंधेरे-अंधेरे उठकर महिलाऐं चौकी के नीचे दीपक लगाकर रूप पाने के लिए सिर धोकर स्नान करती है। इस दिन शाम को घर के अंदर व बाहर दीपक जलाते है।

छोटी दीपावली पूजा विधि:-सूर्योदय से पहले उठकर अपनी दैनिकचर्या को पूरा करते हुए पहले आटा तेल को हल्दी में मिलाकर उबटन तैयार करना चाहिए।

◆उसके बाद उस उबटन को अपने शरीर पर मलकर स्नान करना चाहिए।

◆शाम के समय एक थाली में चहुमुखी दीपक और सोलह छोटे दीपक लेकर तेलबाती डालकर जलाना चाहिए।

◆फिर घर के अंदर व बाहर कोने-कोने पर दीपक को रखना चाहिए।

◆चहुमुखी दीपक को मुख्य द्वार पर रखना चाहिए।

राजा बलि की पौराणिक कथा:-एक समय की बात है, जब धर्मराजजी अपना राज्य हार जाते है, तो भगवान केशवजी से धर्मराजजी बहुत ही विन्रमता के भाव से पूछते- हे श्रीकेशवजी! आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताए जिसको करके मैं पुनः अपने हारे हुए राज्य को प्राप्त कर सकूं, क्योंकि मैं अपने राज्य को हर जाने के कारण बहुत ही दुःखी हूँ।

श्रीकेशवजी ने कहा- हे कौन्तेय पुत्र धर्मराज। मैं तुम्हें मेरे बहुत प्रिय भक्त राक्षसाधिराज बलि के बारे में बताता हूँ। राजा बलि ने सौ अश्वमेघ यज्ञ करने का एक समय संकल्प लिया। लेकिन निन्यानबे यज्ञ तो राजा बलि के बिना किसी बाधा के पूर्ण हो गए, लेकिन सौवाँ यज्ञ के पूरे होने पर अपना राज्य को छोड़ने का डर सताने लगा। जब देवताओं के राजा इंद्रदेव को डर सताने लगा कि राजा बलि ने यदि सौवाँ अश्वमेघ यज्ञ कर लिया तो मेरी इंद्रपुरी पर आक्रमण करके कहीं छीन नहीं लेवें। इस चिंता में राजा इंद्रदेव अपने साथ सभी देवताओं को लेकर क्षीरसागर में रहने वाले भगवान श्रीहरीजी के पास पहुँचे। वहां पर पहुंचकर भगवान श्रीहरीजी का वेद-मंत्रों से स्तुति करने लगे। जब भगवान विष्णु जी ने जब अपनी आंखों को खोल और देखा की सभी देवताओं के साथ इंद्रदेव भी स्तुति कर रहे है तब भगवान विष्णुजी ने पूछा-हे इंद्रदेव! आपको इन सभी देवताओं के साथ लेकर कैसे आना हुआ? 

तब इंद्रदेव बोलते है कि- हे श्रीचक्रपाणीजी! हम सब डर के मारे आपके शरण में आये है, जब इंद्रदेव ने पूरा वृत्तांत भगवान श्रीकेशवजी को बताया। 

तब भगवान श्रीहरीजी बोले-हे इंद्रदेव! तुम बिना किसी तरह का डर मत रखो। बिना किसी डर के तुम अपने इंद्रपुरी को प्रस्थान करूँ, तुम्हें चिंता करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है और मैं तुम्हारे जो भी मन बसे संकट है उनका शमन कर दूंगा। इस तरह के भगवान श्रीविष्णुजी के आश्वासन देने पर इंद्रदेव अपने लोक की ओर चल पड़े।

इंद्रदेव के जाने के बाद भगवान चक्रपाणीजी ने वामन अवतार को धारण किया और अपने बटुवेश अर्थात नाटे कद को ग्रहण करके राजा बलि के यहाँ पर चल पड़े। जब सौवाँ यज्ञ सम्पन्न् होने पर राजा बलि सभी को दान देने लगे। 

इस तरह दान देते-देते भगवान श्रीकेशवजी के रूप में वामन रूप धारी श्रीविष्णुजी से राजा बलि ने कहा- हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! आप को दान में क्या चाहिए! तब वामन रूपधारी श्रीविष्णुजी ने कहा कि-हे राजन! यदि आप मुझे दान देने के इच्छुक है तो मुझे पहले आप वचन देवे की जो भी मैं मांगूगा वह मुझे आप देवेंगे। तब राजा बलि ने वामनदेव को वचन दे दिया।

राजा बलि ने कहा कि- हे ब्राह्मणदेव! आप मांगिए मैं अपने वचन के अनुसार आपको दूंगा। तब वामनधारी श्रीविष्णुजी ने तीन पग भूमि दान के रूप में मांगी। 

तब राजा बलि ने कहा-हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपकी इच्छानुसार आप तीन पग भूमि को ले लीजिए। तब भगवान वामनधारी श्रीविष्णुजी ने अपना विराटरूप प्रकट किया और एक पैर में सम्पूर्ण पृथ्वी को नाप लिया। 

दूसरे पैर से संपूर्ण अन्तरिक्षलोक को नाप लिया और कहा कि- हे राजन! तीसरे पग को कहा रखूं। तब राजा बलि ने कहा कि- हे चक्रपाणीजी जी! अपने दोनों लोको को ले लिया है अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। आप से निवेदन करता हूँ कि आप तीसरा पैर मेरे सिर पर रख दीजिए। इस तरह भगवान श्रीविष्णुजी ने राजा बलि से तीन पग भूमि के रूप में प्राप्त की और राजा बलि की दानशीलता से खुश होकर कहा- हे राजन! मैं तुम्हारी दानशीलता से बहुत ही खुश हूं। तुम कोई भी वरदान मांगों।

राजा बलि ने कहा- हे श्रीहरीजी! आप मुझे ऐसा वरदान देवे की कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तिथि तक अर्थात दीपावली तक इस भूमिलोक पर मेरा राज्य रहे। इन तीन दिनों तक सभी लोग दिप-दान कर लक्ष्मीजी की पूजा करे और जो इन तीन दिनों में दिन दान करके लक्ष्मीजी की पूजा करने वाले के घर में लक्ष्मीजी का निवास रहे। इस तरह भगवान श्रीविष्णुजी ने राजा बलि को अपनी इच्छानुसार वरदान देकर और राजा बलि को पातालपुरी का राज्य देकर राजा बलि को पाताललोक में भेज दिया। उसी समय से देश के सम्पूर्ण नागरिक इस पुनीत पवन दीपावली पर्व को मनाते चले आ रहे है। इसलिए इस पर्व को सभी प्राणियों को सद्भावनापूवर्क मनाना जरूरी ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है।

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Wednesday, 8 September 2021

September 08, 2021

गणेश चतुर्थी व्रत कथा एवं पूजा विधि(Ganesh Chaturthi Vrat katha & puja vidhi)






गणेश चतुर्थी व्रत कथा एवं पूजा विधि(Ganesh Chaturthi Vrat katha & puja vidhi):-गणेश चतुर्थी भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी तिथि कहा जाता हैं। इस चतुर्थी तिथि के दिन ही हमारे धर्म शास्त्रों में श्री गणेशजी का जन्म बताया गया है। इसलिए इस दिन को गणेश जी के जन्म होने के कारण ही उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता हैं। इस पर्व का हिंदुओं के लिए बहुत महत्व माना जाता है। क्योंकि यह पर्व ग्यारह दिवस तक चलता है। इस पर्व पर जो भी मनुष्य श्री गणेश जी प्रतिमा को अपने घर में स्थापित करके उनकी पूजा दश दिवस तक की जाती है। उसके बाद ग्यारहवें दिवस गणेश जी की पूजा करके उनको श्रृंगार आदि करके उनकी प्रतिमा को किसी बहते जल स्थान पर विसर्जित करते है। इस तरह यह पर्व आनन्द एवं सभी तरह की खुशियों का माना जाता है। गली-गली में गणेश भगवान की मूर्ति को मोहल्ले के बीच की जगह पर स्थापित करते है। इस तरह गली-गली और मोहल्ले में स्त्रियों, पुरुष और बच्चे डांडिया नृत्य दस दिन तक करते है। इस तरह दश दिन तक यह पर्व में प्रतियोगिताएं रखकर बच्चों को प्रोत्साहित कर पुरस्कार का भी वितरण किया जाता हैं।



गणेश के जन्म होने की पौराणिक कथा:- एक बार भगवान शंकरजी स्नान के लिए कैलाश पर्वत से भोगवती नामक स्थान पर गए। उसी समय घर पर पार्वती स्नान करते समय अपने मैल का एक पुतला बनाकर उसे सजीव कर दिया। उसी का नाम देवी ने गणेश रखा। गणेश को देवी ने आज्ञा दी कि मैं स्नान कर रही हूँ। जब तक बाहर से कोई अंदर नहीं आ पावे। थोड़े समय के बाद ही शंकरजी आ गए और घर के अंदर जाने लगे। तब द्वार के ऊपर खड़े गणेश ने उनको अन्दर जाने से रोका। इस तरह काफी समझाने पर भी गणेश नहीं माने तो शिवजी ने उनका सिर को अपनी त्रिशूल से काट दिया। टेढ़ी भृकुटी वाले शिव जब अन्दर पहुँचे तो शैलजा ने समझा कि देरी होने के कारण कुपित हो रहे हैं। इसलिए शीघ्र ही दो पात्र में भोजन परोस कर लाई। दो पात्रों को देखकर शिवजी ने पूछा कि यह दूसरा पात्र किसका हैं? पार्वती बोली कि बाहर जो दरवाजे पर पहरा देने वाले मेरे लाड़ले पुत्र गणेश का हैं। यह सुनकर शिवजी ने कहा कि मैंने तो उसकी जीवनलीला समाप्त कर दी। वह मुझे अन्दर ही नहीं आने दे रहा था तो पार्वती बहुत ही दुःखी हुई और प्रिय पुत्र को पुनः जीवन देने के लिए आग्रह किया। पार्वती को प्रसन्न करने के लिए शंकर भगवान ने अपने गणों को कहा जो माँ अपने बच्चे से पुट फेर कर सो रही हो उस बच्चे का सिर ले आओ। तब उन्होंने एक हथिनी को देखा जो अपने नवजात शिशु से पुट फेर कर सो रही थी। तब गण उस बच्चे का सिर काट कर ले आए और उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। तब पार्वती ने कहा-इतना कुरूप बच्चा मुझे नहीं चाहिए। तब शंकर भगवान ने कहा की मैं इसे आशीर्वाद देता हूँ कि इस संसार में जिसके भी घर में मांगलिक कार्य एवं विवाह आदि में गणेश की प्रथम पूजा करेंगे, फिर इसके पश्चात कोई दूसरा काम होगा। इसलिए इस मृत्यु लोक में सभी कार्य रिद्धि-सिद्धि सहित पूरे होते हैं। अन्न-धन का भण्डार रहता हैं। यह सुनकर पार्वती ने प्रसन्नतापूर्वक पति-पुत्र को भोजन कराया और स्वयं ने भी भोजन किया। यह घटना भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को घटित हुई थी। इसलिए इसका नाम गणेश चतुर्थी पड़ा। 



गणेश चतुर्थी का व्रत करने की विधि:-मनुष्य को अपने सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति पाने के लिए गणेश जी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत की विधि इस तरह है:

◆भाद्रपद महीने की शुक्लपक्ष की चौथ को गणेश चतुर्थी का व्रत करना चाहिए।

◆गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर अपनी दैनिकचर्या से निवृत होकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र को धारण करना चाहिए।

◆भगवान श्रीगणेश जी की सोने की, चांदी की, तांबे की, मिट्टी या गोबर से मूर्ति बनवाकर या बनाकर मूर्ति को पूजा के रूप में उपयोग में लेना चाहिए।

◆उसके बाद में अपने भवन में पूजाघर की जगह पर भगवान श्रीगणेशजी की मूर्ति को एक स्वच्छ जगह पर स्थापित करना चाहिए।

◆इस व्रत में भगवान गणपति जी की मूर्ति को चांदी के बरक लगाकर उनकी मूर्ति का श्रृंगार करना चाहिए।

◆भगवान गणेश जी, नव ग्रहों, वरुण देव और माता पार्वती जी की स्थापना करके पूजा करनी चाहिए।

◆सामग्री के रूप में दूध, दही, घृत, शक्कर, गंगाजल, पुष्प, दूर्वा, कंकु, मौली, गुड़, मोदक के लड्डू, पंचामृत, फूल की माला, सुपारी, सजावट के लिए बन्दरवाल, तांबे का लोटा, अबीर, गुलाल, सिंदूर, अगरबती, दिया व बाती, पांच जात के फल, पीली चीजो का विशेष बेशन से बनी हुई वस्तुए जिनमें लड्डू और पंचमेवा आदि लेनी चाहिए।

◆सबसे पूर्व सभी वरुणदेव जी की पूजा करनी चाहिए।

◆उसके बाद में नव ग्रहों की पूजा करनी चाहिए।

◆माता पार्वती जी की पूजा भी इस दिन करने से अच्छे फल की प्राप्ति होती हैं।

◆सबसे अंत में गणेश जी का पंचामृत से अभिषेक करके षोडशोपचार विधि पूजन करके उनसे अरदास करनी चाहिए।

◆इक्कीस मोदकों का भोग लगाया जाना चाहिए।

◆हरी दूर्वा के इक्कीस अंकुर लेकर गणेशजी के दस नामों को बोलते हुए चढ़ाने चाहिए।

◆चतुर्दशी तिथि के समय तक उनका पूजन किया जाता है।

◆दस दिन तक रात्रिकाल में जागरण और भगवान गणेशजी के गुणों का गुणगान होता हैं।

◆उसके बाद चतुर्दशी तिथि को गणेशजी की प्रतिमा या मूर्ति को किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान कराकर उनका विसर्जन कर देते हैं।

◆गणेश जी पूजा अर्चना करने के बाद उनकी आरती को पढ़ना चाहिए।

◆भगवान गणेश जी की पूजा के साथ ही साथ बाल चन्द्र देव की भी पूजा करनी चाहिए।



।।अथ श्री गणपति भगवान जी आरती की।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

धूप चढ़े खील चढ़े और चढ़े मेवा।

लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।।

जय गणेश,जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

एकदन्त दयावन्त,चार भुजा धारी।

मस्तक सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी।।

जय गणेश,जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।

बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

पान चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा।

सूर श्याम शरण आये सुफल कीजे सेवा।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

दीनन की लाज राखो शम्भु-सुत वारी।

कामना को पूरा करो जग बलिहारी।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

।।इति श्री गणपति जी की आरती।।

।।जय बोलो गणपति बापा की जय हो।।

              ।।श्री गणेशाय नमः।