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Sunday, 18 June 2023

June 18, 2023

श्री राम रक्षा स्तोत्र का क्या महत्व हैं?(What is the importance of Shri Ram Raksha Stotra?)

श्री राम रक्षा स्तोत्र का क्या महत्व हैं?(What is the importance of Shri Ram Raksha Stotra?):-सभी परेशानियों का रामबाण इलाज श्री राम रक्षा स्तोत्र में है समस्याओं का अचूक इलाज। जहाँ भगवान श्री राम का नाम आ जाए ऐसा होना भी संभव हैं। लंका चढ़ाई के लिए बनाए गए सेतु पुल में पत्थर तैरने लगे थे, उन पत्थरों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का ही नाम था। संस्कृत साहित्य में किसी भी देवी-देवता की स्तुति के लिए लिखे गये काव्य को स्तोत्र कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि राम रक्षा स्तोत्रम का जाप विधि अनुसार करने से मनुष्य की सारी परेशानियाँ, विपदाएं दूर हो जाती हैं। भगवान राम के नाम में ही इतनी शक्ति है कि व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श सदैव हमारे लिए प्रेरणास्रोत का कार्य करते हैं। इसलिए जो व्यक्ति राम रक्षा स्तोत्र को जपता है तो उसके अंदर अच्छे गुणों का विकास होता है। वह व्यक्ति हमेशा ही सच्चे मार्ग पर चलता है तथा अपने सिद्धांतों पर कायम रहते हुए बुराइयों को पराजित करता है। उसका व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणा का कार्य करता है। अड़तीस श्लोकों का यह स्तोत्र बेहद ही शक्तिशाली हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति श्रीराम के दिखाए गए मार्ग पर चलता है। उसे दैवीय शक्ति की आवश्यकता होती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि राम का मार्ग बेहद कठिन है। आज के युग में इस पर चलना आसान नहीं है। इसलिए राम रक्षा स्तोत्र से व्यक्ति को इस मार्ग पर चलने की शक्ति मिलती हैं।

 


 

What is the importance of Shri Ram Raksha Stotra?




 


श्री राम रक्षा स्तोत्र की रचना:-राम रक्षा स्तोत्र की रचना बुध कौशिक (वाल्मीकि) ऋषि ने की थी। परंतु पौराणिक कथा के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि महादेव शंकर स्वयं बुध कौशिक के स्वप्न में आए थे और उन्होंने ही ऋषि को श्री राम रक्षा स्तोत्र सुनाया था। जब सवेरा हुआ तो बुध कौशिक ने इस स्तोत्र को लिखा लिया। यह स्तोत्र देववाणी संस्कृत में हैं। आवश्यक नहीं है कि यह स्तोत्र केवल संकट के समय पढ़ा जाए। शुभ फल और भगवान श्री राम का आशीर्वाद पाने के लिए इसे सामान्य परिस्थिति में भी जपा जा सकता है। इसके उच्चारण से निकली शब्द ध्वनि वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा संचालित करती हैं।




श्रीरामरक्षास्तोत्रम् का विनियोग:-किसी भी स्तोत्रं का वांचन करने से पूर्व उस स्तोत्रं के देवी-देवताओं को मन में धारित करते हुए उन पर पूर्णरूप से आस्था एवं श्रद्धाभाव रखते हुए स्तोत्रं के पाठ का संकल्प करना चाहिए।


श्रीगणेशायनमः विनियोग:-


अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः।


श्रीसीतारामचंद्रोदेवता अनुष्टुप् छन्दः


सीता शक्तिः श्रीमद्हनुमान् कीलकम्


श्रीसीतारामचंद्र प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।।


अर्थात्:-प्रथम पूज्य गणेशजी को हाथ जोड़कर नमन करते हुए, श्रीरामरक्षा स्तोत्रम् श्लोकों में मंत्रों की रचना बुधकौशिक ऋषिवर ने की थी, सीता एवं रामचंद्र देवता के रूप में हैं, जिसमें अनुष्टुप छंद हैं एवं सीता शक्ति के रूप में हैं, जिसमें हनुमानजी कीलक हैं, जो कोई श्रीरामरक्षा स्तोत्रम् के श्लोकों में वर्णित मंत्रों के द्वारा इनके देवता को याद करते हुए श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए वांचन का संकल्प करता हैं।



अथ ध्यानम्:-श्रीरामरक्षा स्तोत्रम् का पाठ करने से पहले भगवान् श्रीरामजी का ध्यान करना चाहिए, जिससे मन में किसी तरह की गलत भावना जागृत नहीं हो सकें और मन एक जगह पर स्थिर रहे। 


ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं।


पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।।


वामांकारुढ़सीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं।


नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचंद्रम्।।


              ।।इति ध्यानम्।।


चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।


एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।।1।।


ध्यात्वा निलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।


जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्।।2।।


सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्त चरान्तकम्।


स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।3।।


रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।


शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।।4।।


कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।


घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रत्रिवत्सलः।।5।।


जिह्वा विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः।


स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः।।6।।


करौ सीतपतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।


मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।7।।


सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।


ऊरू रघुत्तमः पातु रक्षः कुलविनाशकृत्।।8।।


जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः।


पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोSखिलं वपुः।।9।।


एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।


स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।।10।।


पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिणः।


न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।11।।


रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्।


नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।12।।


जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।


यः कण्ठे धारयेत्तस्य  करस्थाः सर्वसिद्धयः।।13।।


वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।


अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम्।14।।


आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।


तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।।15।।


आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।


अभिरामस्त्रिलोकनां रामः श्रीमान् स नः प्रभु।।16।।


तारणौ रूपसंपन्नो सुकुमारौ महाबलौ।


पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।17।।


फलमूलाशीनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।


पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।।18।।


शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।


रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतान नो रघूत्तमो।19।।


आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षयाशुगनिषंग सङ्गिनौ।


रक्षणाम मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्।।20।।


संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।


गच्छन्मनोरथोSस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः।।21।।


रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।


काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघुत्तमः।।22।।


वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरूषोत्तमः।


जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेय पराक्रमः।।23।।


इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्विताः।


अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्रोति न संशयः।।24।।


रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पितवाससम्।


स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्ण ते संसारिण़ नरः।।25।।


रामं लक्ष्मणं पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्।


काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्


राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्।


वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्।।26।।


रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे।


रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।27।।


श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।


श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।


श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।


श्रीराम राम शरणं भव राम राम।।28।।


श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।


श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि।


श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये।।29।।


माता रामो मत्पिता रामचंद्रः।


स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।


सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्।


नान्यं जाने नैव जाने न जाने।।30।।


दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।


पुरतो मारूतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्।।31।।


लोकासभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।


कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये।।32।।


मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।


वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।33।।


कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।


आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्।।34।।


आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।


लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।35।।


भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्।


तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्।।36।।


रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।


रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मे नमः।


रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्।


रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर।।37।।


राम रामेति रामेति रमे रमे मनोरमे।


सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।38।।



।।इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्।।



अर्थात्:-इस प्रकार बुध कौशिक द्वारा रचित श्रीराम रक्षा स्तोत्रं संपूर्णम् होता हैं।



                ।।श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु।।




श्रीराम रक्षा स्तोत्र की कैसे सिद्ध करें?(How to prove Shri Ram Raksha Stotra?):-यदि कोई भी इंसान श्रीराम रक्षा स्तोत्र के श्लोकों का वांचन करते हुए उससे अभीष्ट कार्य सिद्धि की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित विधि को अपनाना चाहिए।


सफलता पाने के लिए करें राम रक्षा स्तोत्र से जुड़ा यह टोटका:-


◆सरसों के दाने एक कटोरी में डाल लें।


◆कटोरी के नीचे कोई ऊनी वस्त्र या आसन होना चाहिए।


◆राम रक्षा मन्त्र को 11 बार पढ़े।


◆इस दौरान आपको अपनी उँगलियों से सरसों के दानों को कटोरी में घुमाते रहना है।


◆इस समय भगवान श्री राम की प्रतिमा या फोटो आपके आगे होनी चाहिए जिसे देखते हुए आपको मन्त्र पढ़ना है।


◆ग्यारह बार के जाप से सरसों सिद्ध हो जायेगी।


◆आप उस सरसो के दानों को शुद्ध और सुरक्षित पूजा स्थान पर रख लें।


◆जब आवश्यकता पड़े तो कुछ दाने लेकर आजमायें।


◆यदि किसी कोर्ट-कचहरी में कानूनी वाद-विवाद या मुकदमा हो तो उस दिन सरसों के दाने साथ लेकर जाएँ और वहां डाल दें जहाँ विरोधी बैठता है या उसके सम्मुख फेंक दें। ऐसा करने से उस केस का फैसला आपके हक में आएगा। कोर्ट के बाहर भी फैसला हो सकता है।


◆वहीं यदि आप खेल या प्रतियोगिता या साक्षात्कार में प्रतिभाग करने जा रहे हैं तो शुद्ध सरसों को साथ ले जाएँ और अपनी जेब में रखें। ऐसा करने से आप जिस किसी भी उद्देश्य से घर से बाहर निकले हैं आपका वह उद्देश्य पूर्ण होगा।


◆यात्रा में साथ ले जाएँ आपका कार्य सफल होगा।


◆राम रक्षा स्तोत्र से पानी सिद्ध करके रोगी को पिलाया जा सकता है। रोगी को इसमें लाभ मिलेगा।



श्री राम रक्षा स्तोत्र (Ram Raksha Stotra) को विधि-विधान:-के अनुसार वांचन करना चाहिए। हमारे धार्मिक शास्त्रों में प्रत्येक कर्मकांड को संपन्न करने के लिए विधि-नियम बताए गए हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि हम नित्य पूजा-पाठ करते हैं, अपने इष्ट देवी-देवताओं का स्मरण करते हैं किंतु उसका फल हमें प्राप्त नहीं होता है। ऐसा इसलिए होता है कि हम नियमों की अनदेखी कर पूजा पाठ या फिर ईश्वर की स्तुति करने लगते हैं। राम रक्षा स्तोत्र को भी विधि अनुसार जपना चाहिए। तभी साधक को उसका वास्तविक फल प्राप्त होता है।



श्री राम रक्षा स्तोत्र की जप विधि:-राम रक्षा स्तोत्र के माध्यम से जातकों को विविध क्षेत्रों में सफलता मिलती है। हालाँकि कार्य के अनुरूप ही इसकी विधि में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।


■श्री राम रक्षा स्तोत्र का ग्यारह बार जरूर वांचन करना चाहिए, जो मनुष्य ग्यारह बार इस स्तोत्र का वांचन कर लेते हैं, तो इस स्तोत्र का असर पूरे दिन रहता हैं। 


◆जो मनुष्य श्री राम रक्षा स्तोत्र का वांचन लगातार पैंतालिस दिनों तक नियमित करते हैं, तो इस स्तोत्र का असर दोगुना हो जाता हैं।


◆श्री राम रक्षा स्तोत्र का वांचन नवरात्रि के नौ दिनों में जरूर करना चाहिए। 



◆श्री राम रक्षा स्तोत्र का वांचन करने से पहले देह को पवित्र करके और मन में बुरे विकारों को नहीं आने देना चाहिए और पूरे विश्वास और आस्था के साथ भगवान श्रीराम को अपने मन मंदिर मरण बैठाकर वांचन करना चाहिए। 



रामरक्षा स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?(When should one recite Ram Raksha Stotra?):-मनुष्य को गुरुवार और मंगलवार के दिन श्री राम रक्षा स्तोत्र का वांचन करने से भगवान श्रीराम और हनुमानजी का आशीर्वाद मिल जाता हैं।


श्री राम रक्षा स्तोत्र का लाभ:-श्री राम रक्षा स्तोत्र सभी समस्याओं का रामबाण इलाज है। इस स्तोत्र को जपने से कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। जैसे-


1.मनुष्य की आयु में बढ़ोतरी:-मनुष्य को अकाल मृत्यु से, चोट, दुर्घटना, बीमारी से रक्षा करते हुए आयु में बढ़ोतरी करता हैं।



2.संततिवान:-जिस दम्पत्ति को शादी करने के बहुत समय तक संतान नहीं होने पर श्रीराम रक्षा स्तोत्र का वांचन करने पर संतान की प्राप्ति होती हैं।

 


3.सभी क्षेत्र में तरक्की हेतु:-जो मनुष्य इस स्तोत्र का रोजाना वांचन करते हैं, उनको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तरक्की मिलती हैं। 


4.सभी तरह के सुख एवं रुपये-पैसे की कामना पूर्ति हेतु:-जो मनुष्य अपने जीवन में सभी प्रकार से सुख और रुपये-पैसों की चाहत रखते हैं, उनको स्तोत्र का वांचन करना चाहिए। 



5.शारीरिक कष्टों से राहत:-मनुष्य को अपने जीवन में मिलने वाले शारीरिक कष्टों से राहत हेतु स्तोत्र का वांचन करना चाहिए। 


6.दिलासा हेतु:-मनुष्य को अपने जीवन में प्राप्त होने वाले दुःख और कार्यों में आ रहे विघ्नों में धीरज प्रदान करने में स्तोत्र का अहम भूमिका होती हैं। 


7.अनावश्यक अनिष्ट की शंका से मुक्ति हेतु:-श्रीराम स्तोत्र का वांचन करना चाहिए।


8.बाहरी और ऊपरी बाधाओं से मुक्ति:-जो मनुष्य नियमित रूप से श्रीराम रक्षा स्तोत्र का वांचन करते हैं, उनको यह स्तोत्र एक तरह से सुरक्षित आवरण प्रदान करता हैं। 



9.मंगल ग्रह के बुरे प्रभाव से बचने हेतु:-मनुष्य को मंगलवार के दिन वांचन करना चाहिए, जिससे मंगल ग्रह की अनुकृपा मिल सकें। 



10.बजरंगबली का आशीर्वाद पाने हेतु:-जो मनुष्य श्रीराम रक्षा स्तोत्र का वांचन करते हैं उन पर भगवान श्रीराम के साथ बजरंगबली का आशीर्वाद मिल जाता हैं। 



11.जीवन की सभी विपत्तियों से मुक्ति हेतु:-श्रीराम रक्षा स्तोत्र का वांचन करना चाहिए।










Sunday, 21 May 2023

May 21, 2023

श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् और लाभ

श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् और लाभ (Sri Siddhivinayak Stotram and benefits):-श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् में भगवन् गणपति जी के बारे में बताया गया है। सभी देवी-देवताओं में सर्वप्रथम पूजनीय श्री गणपति जी सभी तरह के विघ्नों को हरने वाले है। गणपति जी के इस स्तोत्रम् का जो मनुष्य नियमित रूप से जाप करता है या बांचन करता हैं उस पर श्रीगणेश जी की अनुकृपा बनी रहती है। इस स्तोत्रम् का पाठ करने से मनुष्य को अपने जीवनकाल में आ रही बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। भगवान गणपति जी बुद्धि के व ज्ञान के देवता है, इसलिए गणपतिजी से बुद्धि व ज्ञान की प्राप्ति के उनसे प्रार्थना करनी चाहिए। भगवन् लम्बोदर जी के इस स्तोत्रम् का जाप करना चाहिए।





Sri Siddhivinayak Stotram and benefits






।।अथ श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् ।।


जयोSस्तु ते गणपते देहि मे विपुलां मतिम्।


स्तवनम् ते सदा कर्तुं स्फूर्ति यच्छममानिशम्।।1।।


प्रभुं मङ्गलमूर्तिं त्वां चन्द्रेन्द्रावपि ध्यायतः।


यजतस्त्वां विष्णुशिवौ ध्यायतश्चाव्ययं सदा।।2।।


विनायकं च प्राहुस्त्वां गजास्यं शुभदायकम्।


त्वन्नाम्ना विलयं यान्ति दोषाः कलिमलान्तक।।3।।


त्वत्पदाब्जाङ्कितश्चाहं नमामि चरणौ तव।


देवेशस्त्वं चैकदन्तो मद्विज्ञप्तिं शृणु प्रभो।।4।।


कुरु त्वं मयि वात्सल्यं रक्ष मां सकलानिव।


विघ्नेभ्यो रक्ष मां नित्यं कुरु मे चाखिलाः क्रियाः।।5।।


गौरिसुतस्त्वं गणेशः शॄणु विज्ञापनं मम।


त्वत्पादयोरनन्यार्थी याचे सर्वार्थ रक्षणम्।।6।।


त्वमेव माता च पिता देवस्त्वं च ममाव्ययः।


अनाथनाथस्त्वं देहि विभो मे वाञ्छितं फलम्।।7।।


लम्बोदरस्वम् गजास्यो विभुः सिद्धिविनायकः।


हेरम्बः शिवपुत्रस्त्वं विघ्नेशोऽनाथबान्धवः।।8।।


नागाननो भक्तपालो वरदस्त्वं दयां कुरु।


सिन्दूरवर्णः परशुहस्तस्त्वं विघ्ननाशकः।।9।।


विश्वास्यं मङ्गलाधीशं विघ्नेशं परशूधरम्।


दुरितारिं दीनबन्धूं सर्वेशं त्वां जना जगुः।।10।।


नमामि विघ्नहर्तारं वन्दे श्रीप्रमथाधिपम्।


नमामि एकदन्तं च दीनबन्धू नमाम्यहम्।।11।।


नमनं शम्भुतनयं नमनं करुणालयम्।


नमस्तेऽस्तु गणेशाय स्वामिने च नमोऽस्तु ते।।12।।


नमोऽस्तु देवराजाय वन्दे गौरीसुतं पुनः।


नमामि चरणौ भक्त्या भालचन्द्रगणेशयोः।।13।।


नैवास्त्याशा च मच्चित्ते त्वद्भक्तेस्तवनस्यच।


भवेत्येव तु मच्चित्ते ह्याशा च तव दर्शने।।14।।


अज्ञानश्चैव मूढोऽहं ध्यायामि चरणौ तव।


दर्शनं देहि मे शीघ्रं जगदीश कृपां कुरु।।15।।


बालकश्चाहमल्पज्ञः सर्वेषामसि चेश्वरः।


पालकः सर्वभक्तानां भवसि त्वं गजानन।।16।।


दरिद्रोऽहं भाग्यहीनः मच्चित्तं तेऽस्तु पादयोः।


शरण्यं मामनन्यं ते कृपालो देहि दर्शनम्।।17।।


इदं गणपतेस्तोत्रं यः पठेत्सुसमाहितः।


गणेशकृपया ज्ञानसिध्धिं स लभते धनम्।।18।।


पठेद्यः सिद्धिदं स्तोत्रं देवं सम्पूज्य भक्तिमान्।


कदापि बाध्यते भूतप्रेतादीनां न पीडया।।19।।


पठित्वा स्तौति यः स्तोत्रमिदं सिद्धिविनायकम्।


षण्मासैः सिद्धिमाप्नोति न भवेदनृतं वचः


गणेशचरणौ नत्वा ब्रूते भक्तो दिवाकरः।।20।।



।।इति श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् अर्थ सहित।।


    ।।जय बोलो श्री गणपति जी की जय।।



श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् का लाभ:-निम्नलिखित हैं।



◆जीवन में कामयाबी हेतु:-जो व्यक्ति नियमित रूप से स्तोत्रं का वांचन करते हैं, उनको अपने जीवन में सभी तरह की कामयाबी मिल जाती हैं।


◆सभी मन की मुराद हेतु:-मनुष्य के मन में सोची हुई मुराद पूरी हो जाती हैं।



◆रुपये-पैसों हेतु:-मनुष्यों को अपने जीवन काल में किसी के आगे रुपये-पैसों के लिए दूसरों के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता हैं।



◆बुद्धि की प्राप्ति हेतु:-जो मनुष्य बुद्धि से कम अक्लमंद होते हैं, उनको स्तोत्रं के वांचन करने से अक्लमंद हो जाते हैं।


◆बुरी ताकतों से मुक्ति हेतु:-बाहरी जगत् की बुरी ताकतें जैसे-भूत-प्रेत व डाकिनी-शाकिनी आदि के प्रभाव से मुक्ति मिल जाती हैं।



◆भाग्य का साथ पाने हेतु:-जब मनुष्य को अपने जीवन में भाग्य का साथ नहीं मिलता हैं, तो सिद्धिविनायक स्तोत्रं का वांचन शुरू करने पर भाग्य का साथ मिलने लग जाता हैं।



◆सन्तान पाने हेतु:-जिन दम्पतियों को शादी करने के बाद भी संतान की चाहत पूर्ण नहीं होती हैं, उनको सिद्धिविनायक स्तोत्र का वांचन शुरू करना चाहिए, जिससे उनको संतान की प्राप्ति हो सके।


Tuesday, 6 September 2022

September 06, 2022

अथ श्री शिव स्तुति स्तोत्रं(Ath Shri Shiva Stuti Stotram)


अथ श्री शिव स्तुति स्तोत्रं(Ath Shri Shiva Stuti Stotram):-भगवान शिवजी की खुश करना है उनसे उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है तो मनुष्य को उनके शिव स्तुति का जाप हमेशा करना चाहिए। जो व्यक्ति नियमित रूप से ईश्वर की पूजा नहीं कर पाता हैं तो उनको अपनी इच्छानुसार जिस देव-देवी में श्रद्धा होती है उस देव-देवी के स्तुति स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। उस स्तुति स्तोत्रं से भी वह फल की प्राप्ति होती है जो कि उस देव की पूजा-अर्चना से मिलता है। सभी देवों में शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवों में शिवजी होते है जो कि अपने भक्त की थोड़ी सी पूजा से भी प्रसन्न हो जाते है और अपने भक्त का उद्धार कर देते है।





Ath Shri Shiva Stuti Stotram




         

अथ श्री शिव स्तुति स्तोत्रं अर्थ सहित(Atha Sri Shiva Stuti Stotram with meaning):-भगवान् शिवजी की श्री शिव स्तुति स्तोत्रं के वांचन करने से पूर्व उसके श्लोकों में वर्णित अर्थ को जानना बहुत जरूरी हैं, उन श्लोकों के अर्थ को जानने के बाद ही वांचन करने से फायदा मिलता हैं। श्री शिव स्तुति स्तोत्रं अर्थ सहित निम्नलिखित हैं।



धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


अर्थात्:-हे भोलेनाथ! आप दीनों पर दया करने वाले हो और आपने पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक और पाताल लोक को अलग-अलग हिस्सों में कर दिया। इसलिए सभी आपके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। हे शम्भू! मैं आपसे अरदास करता हूँ कि थोड़े समय में मेरे निवास स्थान में रुपयों-पैसों सहित ऐश्वर्य को भर दीजिए। 


प्रथम वेद तो ब्रह्मा को दे दिया बने वेद के अधिकारी।


विष्णु को दिया चक्र सुदर्शन लक्ष्मी सी सुन्दर नारी।।


अर्थात्:-हे शिवजी! आपने सबसे पहले आध्यत्मिक ज्ञान के चार धर्म ग्रन्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अर्थववेद आदि चारों वेदों को ब्रह्माजी को देकर वेदों के स्वामी बना दिया।

विष्णु जी को सुदर्शन चक्र एवं शोभायमान लक्ष्मी जी रूपी पत्नी दे दी।



इन्द्र को दिया कामधेनु और ऐरावत सा बलकारी।


कुबेर को कर दिया आपने सारी सम्पत्ति का अधिकारी।।


अर्थात्:-हे शिवजी! आपने समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में से सभी की कामना की पूर्ति करने वाली कामधेनु गाय को एवं समस्त तरह की शक्तियों वाले ऐरावत हाथी स्वर्ग के देवता इन्द्र को दे दिया। धन-सम्पत्ति एवं हीरे-जवाहरात आदि का स्वामी कुबेर को बना दिया।



अपने पास पात्र नहीं रखा, मग्न रहे बाघाम्बर में।


अमृत तो देवताओं को दे दिया, आप हलाहल पान किया।


ब्रह्म ज्ञान दे दिया उसी को, जिसने शिव तेरा ध्यान किया।।


अर्थात्:-हे शिवजी! आप बाघ की रोयेंदार चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले हो और अपने पास किसी भी तरह का पात्र नहीं रखते हो। आपने समस्त तीनों लोकों की भलाई के हलाहल विष को पी लिया और अमृत को देवताओं को दे दिया। जिसने भी शिवजी के प्रति विश्वास एवं श्रद्धा भाव रखते हुए उनके गुनगान का बखान किया उसी को ब्रह्म ज्ञान दे दिया।




भगीरथ को दे दी गंगा, सब जग ने स्नान किया।


बड़े-बड़े पापियों को तारा, पलभर में कल्याण किया।।


आप नशे में मस्त रो, पियो भंग नित खप्पर में।


अर्थात्:-हे शिवजी! आपने समस्त धर्म एवं नीति के विरुद्ध किये जाने वाले बुरे कर्मों से मुक्ति प्रदान करने वाली एवं जीवन-मरण के बन्धन से मुक्ति दिलवाने वाली गंगा को भागीरथ दे दिया जिससे सभी जगत के वासियों ने स्नान करके अपनी गति को प्राप्त किया। जिन्होंने बहुत बुरे कर्मों को किया उनका भी आपने थोड़े समय में उद्धार किया। हे शिवजी! आप भांग रूपी मादक द्रव्य को हमेशा खप्पर या खोपड़ी रूपी पात्र में पीकर अपनी धुन में रहो।



लंका तो रावण को दी, बीस भुजा दस शीश दिए।


रामचन्द्र को धनुष बाण और हनुमत् को जगदीश दिये।।


अर्थात्:-हे शिवजी! आपने सोने की बनी हुई लंका एवं बीस भुजा और दश सिर रावण को दे दिए। श्रीरामचन्द्र को धनुष एवं बाण और हनुमानजी को जगत के पालन हार को दे दिया।



मनमोहन को दे दी मोहनी और मुकुट बख्शीश दिए।।


मुक्त हुए काशी के वासी, भक्ति में जगदीश दिए।


वीणा तो नारद को दे दी, हरि भजन को राग दिया।


अर्थात्:-हे शिवजी! आपने मन को लुभाने वाली मोहिनी रूप को एवं सिर पर शिरोभूषण के रूप में मुकुट श्रीकृष्ण को उपहार स्वरूप दे दिया, काशी में निवास करने वाले मुक्त एवं आराधना करने से जगत के स्वामी को दे दिया, वीणा वाद्य यंत्र नारद को दे दिया और विष्णु की स्तुति करने वाले को प्रेम दिया।



ब्राह्मण को कर्मकाण्ड और सन्यासी को त्याग दिया।


जिस पर तुमरी कृपा भई, उसी को अनगन राग दिया।


जिसने ध्याया उसी ने पाया महादेव तेरे वर में।।


अर्थात्:-हे शिवजी! आपने ब्राह्मण को यज्ञ, संस्कार जो नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मों के विधान एवं संन्यास आश्रम में रहने वाले को सांसारिक विषयों और व्यवहारों को छोड़ने का भाव दे दिया।

हे शिव भाई! आप उदरतापूर्वक दूसरों की भलाई करने वृत्ति की मेहरबानी कर देते हो और उस पर बहुत अनुराग रखते हुए हरक्षण अपनी छत्रछाया में रखते हो। जिस किसी ने आपकी श्रद्धसपूर्वक एवं विश्वास से भक्ति पूजा-अर्चना की उसी को आपने दर्शन देकर मनवांछित आशीर्वाद प्रदान कर देते हो।



           ।।इति श्री शिव स्तुति स्तोत्रं।।


        ।।जय बोलो शिव शंकरजी जय।।


   ।।जय बोलो उमापति शिवजी की जय।।


              ।।अथ श्री शिव स्तुति।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


प्रथम वेद तो ब्रह्मा को दे दिया बने वेद के अधिकारी।


विष्णु को दिया चक्र सुदर्शन लक्ष्मी सी सुन्दर नारी।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


इन्द्र को दिया कामधेनु और ऐरावत सा बलकारी।


कुबेर को कर दिया आपने सारी सम्पत्ति का अधिकारी।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


अपने पास पात्र नहीं रखा, मग्न रहे बाघाम्बर में।


ऐसे दीनदयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पल भर में।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


अमृत तो देवताओं को दे दिया, आप हलाहल पान किया।


ब्रह्म ज्ञान दे दिया उसी को, जिसने शिव तेरा ध्यान किया।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


भगीरथ को दे दी गंगा, सब जग ने स्नान किया।


बड़े-बड़े पापियों को तारा, पलभर में कल्याण किया।।


आप नशे में मस्त रो, पियो भंग नित खप्पर में।


ऐसे दीन दयाल मेरे शम्भू, भरो खजाना पल भर में।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


लंका तो रावण को दी, बीस भुजा दस शीश दिए।


रामचन्द्र को धनुष बाण और हनुमत् को जगदीश दिये।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


मनमोहन को दे दी मोहनी और मुकुट बख्शीश दिए।।


मुक्त हुए काशी के वासी, भक्ति में जगदीश दिए।


वीणा तो नारद को दे दी, हरि भजन को राग दिया।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।


ब्राह्मण को कर्मकाण्ड और सन्यासी को त्याग दिया।


जिस पर तुमरी कृपा भई, उसी को अनगन राग दिया।


जिसने ध्याया उसी ने पाया महादेव तेरे वर में।।


धन्य धन्य भोलेनाथ बाँट दिए तीनो लोक पल भर में।


ऐसा दीन दयाल मेरे शम्भू भरो खजाना पलभर में।।



           ।।इति श्री शिव स्तुति स्तोत्रं।।


        ।।जय बोलो शिव शंकरजी जय।।


   ।।जय बोलो उमापति शिवजी की जय।।

Monday, 8 August 2022

August 08, 2022

शिव पञ्चरत्नम् स्तुति(Shiva Pancharatnam Stuti)

Shiva Pancharatnam Stuti





शिव पञ्चरत्नम् स्तुति(Shiva Pancharatnam Stuti):-भगवान शिवजी की अनुकृपा पाने के लिए श्रीकृष्णजी ने शिवपञ्चरत्नम् स्तुति की रचना की थी। इस स्तुति में पांच श्लोक हैं। इन पांच श्लोकों में शिवजी को अपनी पूजा से किस तरह से खुश किया जाता हैं, उनको खुश करने के लिए शिव पञ्चरत्नम् स्तुति का वांचन मनुष्य को नियमित रूप से करना चाहिए। जो मनुष्य नियमित रूप से इस स्तुति को करते हैं, उनको त्रिदेवों एवं त्रिदेवियों का भी आशीर्वाद प्राप्त हो जाता हैं। यह स्तुति शिवपुराण में बताई गई हैं, जो इस तरह हैं-


 

अथ शिवपञ्चरत्नम् स्तुति शिवमहापुराणे:-शिवपुराण में भगवान शिवजी को खुश करने के लिए श्रीकृष्णजी के द्वारा र्चित शिवपञ्चरत्नम् स्तुती के बारे में वर्णन मिलता हैं।



      ।।अथ शिवपञ्चरत्नम् स्तुती शिवमहापुराणे।।


श्रीकृष्ण उवाच:-भगवान श्रीकृष्णजी कहते हैं, की मनुष्य को नियमित रूप से शिवपञ्चरत्नम् स्तुती का वांचन करते रहना चाहिए, जिससे भगवान भोलेनाथ जी का आशीर्वाद मनुष्य को मिल सके, क्योंकि भगवान भोलेनाथजी सबसे पहले अपने भक्त की भक्ति पर प्रसन्न होते हैं।



मत्तसिन्धुरमस्तकोपरि नृत्यमानपदाम्बुजम्।


भक्तचिन्तितसिद्धिदानविचक्षणं कमलेक्षणम्।


भुक्तिमुक्तिफलप्रदं भवपद्मजाSच्युतपुजितम्।


कृत्तिवाससमाश्रये मम सर्वसिद्धिदमीश्वरम्।।१।।



वित्तदप्रियमर्चितं कृतकृच्छ्रतीव्रतपश्चरैः।


मुक्तिकामिभिराश्रितैर्मुनिभिर्दृढामलभक्तिभिः।


मुक्तिदं निजपादपङ्कजसक्तमानसयोगिनाम्।


कृत्तिवाससमाश्रये मम सर्वसिद्धिदमीश्वरम्।।२।।



कृतदक्षमखाधिपं वरवीरभद्रगणेन वै।


यक्षराक्षससमर्त्यकिन्नरदेवपन्नगवन्दितम्।


रक्तभुग्गणनाथहृदभ्रमराञ्चिताङ्घ्रिसरोरुहम्।


कृत्तिवाससमाश्रये मम सर्वसिद्धिदमीश्वरम्।।३।।



नक्तनाथकलाधरं नगजापयोधरनीरजा- 


लिप्तचन्दनपङ्ककुङ्कुमपङ्किलामलविग्रहम्।


शक्तिमन्तमशेषसृष्टिविधायकं सकलप्रभुम्।


कृत्तिवाससमाश्रये मम सर्वसिद्धिदमीश्वरम्।।४।।



रक्तनीरजतुल्यपादपयोजसन्मणिनूपुरम्।


पत्तत्रयदेहपाटनपङ्कजाक्षशिलीमुखम्।


वित्तशैलशरासनं पृथुशिञ्जिनीकृततक्षकम्।।५।।



फलश्रुतिः-फलश्रुति का मतलब हैं, इसमे किसी भी कर्म को करने पर उस कर्म के करने से प्राप्त होने वाले फल के बारे में वर्णन होता हैं। जिससे सुनकर या पढ़कर या वांचन करके मनुष्य में उस कर्म को करने की तरफ जागृति होती हैं।



यः पठेच्च दिने दिने स्तवपञ्चरत्नमुमापतेः।


प्रातरेव मया कृतं निखिलाघतूलमहानलम्।


तस्य पुत्रकलत्रमित्रधनानि सन्तु कृपाबलात्।


ते महेश्वर शङ्कराखिल विश्वनायक शाश्वत।।६।।



अर्थात्:-जो मनुष्य प्रतिदिन शिव पञ्चरत्न स्तुति का वांचन करता हैं, जिस तरह प्रातःकाल के समय पर बारहमासी बेंत की तरह का एक पौधा होता हैं, उसके गूदेदार बिना रेशे की जड़ से पुष्प खिलता रहता है। जो मनुष्य प्रातःकाल को स्तुति करते हैं, उनको पुत्र सन्तान, सुयोग्य भार्या, मित्र और धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती हैं, इस स्तुति की कृपा से होती है। भगवान शिवजी जो विश्व का संचालन करने वाले प्रत्यक्ष है।



।।इति श्रीशिव महापुराणे च्युतपुरी माहात्म्ये श्रीकृष्ण कृत श्रीशिवपञ्चरत्नस्तुतिः सम्पूर्णम्।।



श्रीशिव पञ्चरत्नम् स्तुति का वांचन करने से मिलने फायदे:-श्रीशिव पञ्चरत्नम् स्तुति का वांचन जो मनुष्य करते हैं, उनको भगवान शिवजी के द्वारा अनेक तरह के फायदे प्रदान करते हैं, जो इस तरह हैं-


1.पुत्र सन्तान पाने हेतु:-जिन मनुष्य को पुत्र सन्तान की चाहत होती हैं और उनको पुत्र सन्तान नहीं हो पाती हैं, तब उन दम्पति को भगवान शिवजी के श्रीशिव पञ्चरत्नम् स्तुति का वांचन शुरू करना चाहिए। जिससे भगवान शिवजी अनुकृपा उस दम्पति पर हो जाती हैं और पुत्र सन्तान की प्राप्ति भी हो जाती हैं। 


2.सुयोग्य भार्या एवं भरतार पाने हेतु:-लड़कीयों एवं लड़को को सुंदर व सुशील गुणवान भरतार एवं भार्या की चाहत को पूर्ण करने के लिए इस स्तुति को करने पर मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं। 


3.अच्छे एवं मदद करने वाले मित्र:-मनुष्य को अपने जीवन में मददगार एवं अच्छे मित्र की जरूरत होती हैं, इसकी पूर्ति के लिए शिवजी की स्तुति करने पर मददगार एवं अच्छे मित्र की प्राप्ति होती हैं।


4.धन-संपत्ति पाने हेतु:-मनुष्य अपने जीवन में भागदौड़ करते है, तब भी वे धन-संपत्ति को संचय नहीं कर पाते हैं। इस तरह की परेशानी से मुक्ति का उपाय शिवजी की स्तुति से संभव हो जाता है।


5.समस्त तरह की सिद्धि पाने हेतु:-मनुष्य बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन तब वे उनके बनते हुए कार्य बिगड़ जाते हैं, जिससे उनके मन में निराशा के भाव उत्पन्न हो जाते है। इस तरह अपने समस्त तरह के कार्य में सफलता को पाने हेतु मनुष्य को श्रीशिव पञ्चरत्नम् स्तुति का वांचन करना चाहिए।

Wednesday, 27 April 2022

April 27, 2022

श्री काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रं(Shri Kashi Vishwanath Mangal Stotram)

Shri Kashi Vishwanath Mangal Stotram




श्री काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रं(Shri Kashi Vishwanath Mangal Stotram):-श्रीकाशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रं की श्रीस्वामी महेश्वरानन्दजी  रचना की हैं, जो कि एक अद्भुत स्तोत्रम् हैं, यह स्तोत्रम् संस्कृत भाषा में लिखा गया हैं, इस स्तोत्रम् के श्लोकों को ग्यारहा माला के रूप में तैयार किया हैं। जो कि भगवान शिवजी के स्वरूप में काशी में स्थित श्रीविश्वनाथजी को शिवजी के रूप में गुणगान करने के लिए बनाया गया हैं। भगवान शिवजी के अनेक नाम हैं, उन नामों में से एक नाम श्रीकाशी विश्वनाथ भी हैं। जो मनुष्य शिवजी को अपनी पूजा-अर्चना से खुश करना चाहते है तो उनको इस स्तोत्रम् का वांचन करना चाहिए, जिससे उनके एक स्वरूप में शिवजी का गुणगान हो जावे और शिवजी का आशीर्वाद मिल जावे। भगवान शिवजी के रूप में श्री काशी में स्थित विश्वनाथ जी के सम्मुख शिवजी के शिवलिंग के सामने बैठकर इस स्तोत्रम् का वांचन करने से निश्चित रूप भगवान की अनुकृपा प्राप्त हो जाती हैं।



अथ श्रीकाशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रं:-श्रीकाशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् के श्लोकों का ध्यान पूर्वक उच्चारण करना चाहिए, जिससे उच्चारण में किसी भी तरह की त्रुटि नहीं रह पावे और सही उच्चारण से मनुष्य को बढ़िया फल मिल सके।

 

गङ्गाधरं शशिकिशोरधरं त्रिलोकी 

रक्षाधरं निटिलचन्द्रधरं त्रिधारम।

भस्मावधूलनधरं गिरिराजकन्या 

दिव्यावलोकनधरं वरदं प्रपद्ये।।१।।


काशीश्वरं सकलभक्तजनातिहारं 

विश्वेश्वरं प्रणतपालनभव्यभारम्।

रामेश्वरं विजयदानविधानधीरं 

गौरीश्वरं वरदहस्तधरं नमामः।।२।।


गङ्घोत्तमाङ्ककलितं ललितं विशालं

तं मङ्गलं गरलनीलगलं ललामम्।

श्रीमुण्डमाल्यवलयोज्ज्वलमञ्जुलीलं

लक्ष्मीशवरार्चितपदाम्बुजमाभजामः।।३।।


दारीव्र्यदुःखदहनं कमनं सुराणां 

दीनार्तिदावदहनं दमनं रिपूणाम्।

दानं श्रियां प्रणमनं भुवनाधिपानां 

मानं सतां वृषभवाहनमानमामः।।४।।


श्रीकृष्णचन्द्रशरणं रमणं भवान्याः 

शशवत्प्रपन्नभरणं धरणं धरायाः।

संसारभारहरणं करुणं वरेण्यं 

संतापतापकरणं करवै शरण्यम्।।५।।


चण्डीपिचण्डिलवितुण्डधृताभिषेकं

श्रीकार्तिकेयक्लनृत्यकलावलोकम्।

नन्दीशवरास्यवरवाद्यमहोत्सवाढ्यं

सोल्लासहासगिरिजं गिरीशं तमीडे।।६।।


श्रीमोहिनीनिविडरागभरोपगूढ़ं 

योगेश्वरेशवरहदम्बुजवासरासम्।

सम्मोहनं गिरिसुताञ्चितचंद्रचूडं 

श्रीविश्वनाथमधिनाथमुपैमि नित्यम्।।७।।


आपद् विनश्यति समृध्यति सर्वसम्पद् 

विघ्नाः प्रयान्ति विलयं शुभम्भ्युदेति।

योग्याङ्गनाप्तिरतुलोत्तमपुत्रलाभो 

विश्वेश्वरस्त्वमिमं पठतो जनस्य।।८।।


वन्दी विमुक्तिमधिगच्छति तूर्णमेति 

स्वास्थ्यं रुजार्दित उपैति गृहन प्रवासी।

विद्यायशोविजय इष्टसमस्तलाभः 

सम्पद्यतेSस्य पठनात् स्तवनस्य सर्वम्।।९।।


कन्या वरं सुलभते पठनादमुष्य 

स्तोत्रस्य धान्यधनवृद्धिसुखं समिच्छन्।

किं च प्रसीदति विभुः परमो दयालुः 

श्रीविश्वनाथ इह सम्भजतोSस्य साम्बः।।१०।।


काशीपीठाधिनाथेन शङ्कराचार्यभिक्षुणा।

महेश्वरेण ग्रथिता स्तोत्रमाला शिवारपीता।।११।।


।।इति श्रीकाशी पीठाधीश्वर शङ्कराचार्य श्रीस्वामिमहेश्वरानन्द सरस्वती विरचितं श्रीविश्वनाथ मङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।


श्रीकाशी विश्वनाथ मङ्गल स्तोत्रम् के वांचन से मिलने वाले लाभ (Benefits of reading Srikashi Vishwanath Mangal Stotram):-मनुष्य को श्रीकाशी विश्वनाथ मङ्गल स्तोत्रम् का वांचन करने से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं-

◆शादी में देरी या शादी का नहीं हो पाने पर:-शादी नहीं हो पाती है या शादी में देरी हो रही है उन लड़कियों को श्रीकाशीविश्वनाथ के स्तोत्रं के श्लोकों का वांचन करने से निश्चित रूप शादी हो जाती हैं।


◆सुयोग्य एवं मन की इच्छानुसार पति पाने हेतु:-जिन लड़कियों को अपने रूप-यौवन के अनुसार सुंदर एवं सुयोग्य पति की चाहत होती हैं, उन लड़कियों को नियमित रूप से इस स्तोत्रम् का वांचन करना चाहिए।

◆धन-संपत्ति की प्राप्ति हेतु:-मनुष्य को मेहनत करने पर भी धन-संपत्ति से सम्बंधित परेशानी होने पर इस स्तोत्रम् का वांचन करना चाहिए, जो हमेशा इस स्तोत्रम् का वांचन करते हैं उन मनुष्य को अपने जीवनकाल में किसी के भी आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती हैं और धन-समृद्धि का भंडार भर जाता हैं।

◆मन की समस्त इच्छाओं को पूरा करने हेतु:-मनुष्य की अनेक तरह की ख्वाहिशे होती हैं, उन ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, लेकिन उन मनुष्य की ख्वाहिशे पूर्ण नहीं हो पाती हैं, उन मनुष्य को इस स्तोत्रम् का वांचन करना चाहिए।

◆जीवन की समस्त बाधाओं से मुक्ति पाने हेतु:-मनुष्य को अपने जीवनकाल में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए इस स्तोत्रम् का पाठन करना चाहिए।

◆समस्त तरह के सांसारिक एवं भौतिक सुख-सुविधाओं को पाने हेतु:-मनुष्य को अपने जीवनकाल में बहुत सारी भौतिक एवं सांसारिक सुख-सुविधाओं की जरूरत पड़ती हैं, उन समस्त सुख-सुविधाओं को पाने का एकमात्र उपाय श्रीकाशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् है, इसके श्लोकों के वांचन से सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हो जाती हैं।

◆सुशील व गुणगान भार्या की प्राप्ति हेतु:-मनुष्य अपनी दाम्पत्य जीवन के लिए सुशील एवं गुणवान भार्या की चाहत रखते हैं, उन मनुष्य को इस चाहत को पूरा करने के इस स्तोत्रम् का वांचन हमेशा करना चाहिए।

◆गुणवान वत्स सन्तान की प्राप्ति हेतु:-मनुष्य को गुणवान वत्स सन्तान को पाने हेतु इस स्तोत्रम् का पाठन करना चाहिए।

◆बन्धन में फंसे होने पर मुक्ति हेतु:-मनुष्य पर दूसरे मनुष्य के द्वारा जलन वश गलत कामों से मनुष्य को बन्धन में फंसा देते हैं, उन बन्धन से मुक्ति पाने हेतु इस स्तोत्रम् का वांचन करना चाहिए।

◆व्याधियों से मुक्ति हेतु:-मनुष्य अपने जीवनकाल में अनेक तरह की व्याधियों से घिरा रहता हैं, उन व्याधियों से बचने के लिए एवं निरोग्यता को पाने के लिए मनुष्य को श्रीकाशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् का वांचन करते रहना चाहिए।

◆दूसरे देश में गए हुए परिजन को वापस अपने देश बुलाने के लिए:-इस स्तोत्रम् का वांचन करने से निश्चित रूप से दूसरे देश में गए मनुष्य वापस आ जाते हैं।

◆छात्रवृत्तिधारी की यादास्त शक्ति बढ़ाने हेतु:-छात्रवृत्तिधारी की यादाश्त शक्ति कमजोर होती हैं और पढ़ने में रुचि नहीं होने वालों को नियमित रूप से इस स्तोत्रम् का वांचन करने से निश्चित रूप से यादाश्त शक्ति बढ़ जाती है और उच्च विद्या को प्राप्त करते हैं। 

 

◆सभी तरह की मन की इच्छाओं को पूरा करने एवं सभी जगह पर जीत पाने हेतु:-मनुष्य को अपने मन की कामनाओं को पूरा करने एवं सभी जगह पर अपनी कामयाबी पाने हेतु इस स्तोत्रम् का वांचन करना चाहिए।




Tuesday, 12 April 2022

April 12, 2022

आदित्य हृदय स्तोत्रं(Aditya Hriday Stotram)

Aditya Hriday Stotram



आदित्य हृदय स्तोत्रं(Aditya Hriday Stotram):-भगवान रामजी युद्ध भूमि के हालात को देखकर मन ही मन में विचार करने लगे, वे युद्ध से सम्बंधित विचारों में खोए होते हैं।तब युद्ध को देखने आए देवताओं के साथ अगस्त्य ऋषिवर रामजी को विचारों में खोया देखा। तब वे उनके पास जाते हैं। तब उन्होंने भगवान रामजी से कहा कि-हे राम! मैं तुम्हें इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए बताया हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो। ऋषिवर अगस्त्य मुनि के द्वारा भगवान रामचन्द्रजी को दशानन रावण पर युद्ध में जीत हासिल करने के लिए वाल्मीकि रामायण के अनुसार "आदित्य हृदय स्तोत्रं" के बारे में बताया गया था। 


श्री आदित्य हृदय स्तोत्रम् का विनियोग:-देवी-देवताओं के निमित संकल्प करने को विनियोग कहते हैं।


ऊँ अस्य आदित्यहृदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः 

आदित्यहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया 

ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

अर्थात्:-हे ब्रह्मस्वरूप! मुनिवर अगस्त्य ऋषि ने श्रीआदित्य हृदय स्तोत्रम् श्लोकों में मंत्रों की रचना की थी, जिसमें अनुष्टुप छंद हैं एवं आदित्यहृदयभूत भगवान हैं, ब्रह्मा देवता के रूप में हैं, जो कोई श्रीआदित्य हृदय स्तोत्रं के श्लोकों में वर्णित मंत्रों के द्वारा इनके देवता को याद करते हुए वांचन का संकल्प करता हैं, उसको सभी जगहों पर विजय, सभी तरह की सिद्धि, ज्ञान के क्षेत्र में सिद्धि और आने वाले विघ्नों से मुक्ति मिल जाती हैं।


पूर्व पीठिता:-आदित्य हृदय स्तोत्रम् के मन्त्रों का उच्चारण करने से पूर्व जो पाठ का वांचन होता हैं, उसे पूर्व पीठिता कहा जाता है। जो निम्नलिखित हैं-


ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।

रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्।।१।।


दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।

उपगम्याबरवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा।।२।।


राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।

येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।।३।।


आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।

जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।।४।।


सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।

चिन्ताशोकप्रशनमायुर्वर्धनमुत्तमम्।।५।।


मूल स्तोत्रं:-आदित्य हृदय स्तोत्रम् के मन्त्रों का उच्चारण करने का मुख्य स्तोत्रं होता है, उसका वांचन करने पर ही उसकी प्रधानता होने से मूल स्तोत्रं कहा जाता है, जो इस तरह हैं- 


रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।

पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।।६।।


सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।

एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।।७।।


एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।

महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यापां पतिः।।८।।


पितरो वसवः साध्याः अश्विनौ मरुतो मनुः।

वायुर्वहिनः प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।।९।।


आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।

सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः।।१०।।


हरिदश्च सहस्त्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।

तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंSशुमान्।।११।।


हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोSहस्करो रविः।

अग्निगर्भोsदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः।।१२।।


व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुः सामपारगः।

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।।१३।।


आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।

कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद् भवः।।१४।।


नक्षत्रग्रहताराणामाधिपो विश्वभावनः।

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोस्तुते ते।।१५।।


नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।१६।।


जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।

नमो नमः सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नमः।।१७।।


नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।

नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोस्तु ते।।१८।।


ब्राह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे।

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः।।१९।।


तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।।२०।।


तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे।

नमस्तमोsभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।२१।।


नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभुः।

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।।२२।।


एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।

एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।।२३।।


देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च।

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभुः।।२४।।


एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।

कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।।२५।।


पूज्यस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्।

एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि।।२६।।


अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।

एवमुक्ता ततोSग्सत्यो जगाम स यथागतम्।।२७।।


एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोSभवत् तदा।

धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयताप्तवान्।।२८।।


आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।

त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।।२९।।


रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्।

सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेSभवत्।।३०।।


अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनां परमं प्रहृष्यमाणः।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।३१।।


          ।।इति आदित्य हृदयं स्तोत्रं सम्पूर्ण।।



आदित्य हृदयं स्तोत्रं के पाठन का महत्त्व और लाभ:-आदित्य हृदय स्तोत्रम् का नियमित रूप से वांचन करने पर निम्नलिखित लाभ मिलते हैं-

◆जीवन की समस्त तरह की परेशानियों से मुक्ति दिलाने में सहायक यह स्तोत्रम् होता हैं। 


◆मनुष्य के मन अनेक तरह के विचार उत्पन्न होते हैं, जिससे मन तय नहीं कर पाता हैं, क्या करूँ या क्या नहीं करूँ इस तरह के विचारों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता हैं। 


◆मनुष्य के जीवन को जीवित रखने वाले हृदय में विकार उत्पन्न होने से बचाने में यह स्तोत्रम् सहायक होता हैं। 


◆मनुष्य के द्वारा नियमित रूप से आदित्य हृदय स्तोत्रम् का वांचन करने पर शत्रुओं से सम्बंधित परेशानी से मुक्ति मिल जाती हैं। 


◆इस स्तोत्रम् के वांचन करने पर नहीं बनने वाले कार्यों में सफलता भी मिल जाती  हैं। 


◆मनुष्य को नीति एवं धर्म के प्रति कार्यों में यह स्तोत्रम् रुचि उत्पन्न करता हैं।


◆इस स्तोत्रम् के वांचन से उम्र में बढ़ोतरी होती हैं। 


◆मनुष्य को सभी तरह के सुख एवं जीवन में मंगल ही मंगल होता हैं। 


◆मनुष्य के मान-सम्मान में वृद्धि होती हैं। 


◆जीवनकाल में इस स्तोत्रम् का वांचन करते रहने पर जोश बढ़कर सब जगहों पर विजय मिल जाती है। 


◆पिता के साथ मधुर सम्बन्ध इस स्तोत्रम् के वांचन करते रहने पर मिलता हैं। 


◆चक्षुओं के विकारों में राहत मिलती हैं। 


◆राजकीय पद की प्राप्ति में यह स्तोत्रम् सहायक होता हैं। 


◆कोर्ट-कचहरी में चलने वाले मामलों में राहत दिलाने में यह स्तोत्रम् सहायक होता हैं। 


◆मनुष्य को हड्डियों से सम्बंधित विकारों से मुक्ति दिलाने में यह स्तोत्रम् सहायक होता हैं।